ईसाई नववर्ष - इतिहास और विस्तृत जानकारी


ईसाई नववर्ष न तो वैज्ञानिक गणनाओं में लाभदायक है और न ही इतिहास की दृष्टि में। अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो ईसाई नववर्ष एक कल्पना है जोकि धार्मिक त्यौहार तो हो सकता है लेकिन खगोलीय घटना से कोई जुड़ाव नहीं है। एक जनवरी को भारत में धूमधाम से मनाती नई पीढ़ी को यह पता होना आवश्यक है कि ईसाई नववर्ष कोई एकमात्र नववर्ष नहीं है जो विश्व में मनाया जाता है बल्कि वैचारिक गुलाम बनाने का एक जरिया मात्र है

मोदी नेतृत्व में विश्व पटल पर चमका भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 


केंद्र में बीजेपी सरकार बनते ही भारत की विदेश नीति में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ है. प्रधानमंत्री जी का वो बयान कि "न हम आँख झुका कर बात करेंगे न आँख दिखाकर बात करेंगे, हम आँख से आंख मिलाकर बात करेंगे" सार्थक होता दिख रहा है. सत्ता में आते ही ताबड़तोड़ विदेशी दौरे करके मोदी जी ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दे दिया था. वर्षो से सुस्त हालत में पड़े रिश्तो में मोदी जी ने बड़ी गर्मजोशी से पक्के किये और पुरे विश्व में भारत की एक पॉजिटिव छवि बना दी. शायद ही कोई ऐसा देश हो जिसका विश्व में थोडा भी प्रभाव है और प्रधानंत्री जी ने वंहा की यात्रा न की हो. आज भारत की पहचान एक ताकतवर राष्ट्र के रूप में होती है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भारत अब अपने विचार रखना शुरू कर चूका है और अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन जैसे देशो के साथ द्विपक्षीय वार्ता में किसी तीसरे देश के बारे में अगर चर्चा हो तो अब नया नही है. पिछले चार साल में मोदी सरकार ने भारत की इमेज को परिवर्तित करके रख दिया है.


हाल ही में अर्जेंटीना में आयोजित G20 सम्मेलन के दौरान भारत - अमेरिका - जापान की त्रिपक्षीय वार्ता हुई. तो वन्ही भारत - चीन - रूस की भी त्रिपक्षीय वार्ता हुई. ये दोनों सामान्य बातें नही है. G20 हो या अन्य बड़े मंच, भारत की विदेश नीति की सफलता साफ झलकती है. इसी के उपर प्रस्तुत है एक विश्लेष्ण- मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और भारत की विदेश नीति 

भारत की पड़ोस नीति :

अगर विदेश नीति का थोड़ा सा निष्कर्ष निकालें तो हम पाएंगे भारत सरकार ने विश्व में किसी एक गुट में रहने की कोशिश नही की बल्कि दुसरो को अपने साथ जुड़े रहने के लिए मजबूर कर दिया है. हम हमारे रिश्ते के मुताबिक पड़ोसियों के साथ बात करें पड़ोसी यानि भारतीय महाद्वीप देशो की तो मोदी जी ने अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, म्यांमार, श्रीलंका, और पाकिस्तान (अनौपचारिक) यात्रा की. आज भारत की अफ़ग़ानिस्तान के साथ रिश्ते काफी अच्छे हैं. अरबो का निवेश किया हुआ है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कभी भी अफ़ग़ानिस्तान पर चर्चा होगी तो कोई भी देश भारत को उस चर्चा से अलग नही रख सकता. नेपाल में वामपंथी सरकार आने के बाद नेपाल का झुकाव चीन की तरफ जरुर हुआ लेकिन भारत ने निवेश जारी रखा हुआ है. हिंदु देश होने के कारण नेपाल की जनता में भारत के प्रति जो छवि है वो वंहा की सरकार आसानी से नहीं मिटा सकती. बांग्लादेश से रिश्ते बेहतर हुए हैं. हमने अपना जमीनी विवाद सुलझाया. वंहा पर निवेश भी किया हुआ है, सबसे महत्वपूर्ण वंहा पर धीरे धीरे बन रहा चीन का बेस, उसको भी समाप्त करने की तरफ हम अग्रसर हैं. म्यांमार के साथ हमेशा से रिश्ते ठीक रहे हैं. रोंहिग्या मुद्दे पर दुनिया ने म्यांमार सरकार को घेरा लेकिन भारत ने हमेशा साथ दिया. भारतीय सेना ने उधर सीमा पार आतंकी ठिकानो को ध्वस्त भी किया. श्री लंका से भारत के रिश्ते हमेशा बढिया रहे हैं और भारत पर लंका की निर्भरता भी है. हालाँकि स्थानीय सरकार कभी चीन की समर्थक होती है तो कभी भारत समर्थक. लेकिन चीन की कर्ज देकर जमीन हडपने की नीति का शिकार श्री लंका हुआ है और उसको यह सबक भारत के और करीब लायेगा.

भारत - मालदीव

मालदीव में हाल ही में सब कुछ ठीक हो गया है. और प्रधानमंत्री मोदी जी की पहली यात्रा हाल ही में हुई है. वंहा के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति भारत समर्थक ही हैं. प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान से भी रिश्ते सुधारने की नई कोशिश की. लेकिन हम कह सकते हैं की भारत ने पूरी तरह पाकिस्तानी प्रेम में डुबकी नही लगायी. सर्वप्रथम शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशो को आमंत्रित करके मोदी जी ने बता दिया था की हम अपने रिश्तो को बेहतर करना चाहते हैं, और फिर अचानक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के अनुरोध पर कराची पहुंच जाना, मोदी जी की विदेशनीति का ही इक्का था.

मोदी की अचानक पाकिस्तान यात्रा - लाहौर एअरपोर्ट पर गार्ड ऑफ़ ऑनर

पाकिस्तान के साथ रिश्ते कभी नही सुधर सकते जबतक वहां पर लोकतंत्र मजबूत नही होगा. और यही कारण है कि पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर चुकी मोदी सरकार ने पाकिस्तान को दुनिया में अलग थलग करने के मिशन पर भी काम किया और सबक सिखाने के लहजे से हम इसमें काफी सफल हुए. आज पाकिस्तान के साथ चीन को छोडकर किसी भी बड़े देश से अच्छे रिश्ते नही हैं. कर्ज में डूबा पड़ा है पाकिस्तान. निवेश नही हो पा रहा, निर्यात भी कम है , पाकिस्तानी रुपया 144 पर आ गया. IMF के आगे हाथ फैला रहा है और मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान बार बार भारत के आगे रिश्ते बेहतर करने के लिए गिगिड़ा रहे हैं. 

भारत शुरुआत में रूस के करीब माना जाता रहा है. लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने शुरुआत में अमेरिका को प्राथमिकता दी. पहले बराक ओबामा को गणतंत्र दिवस पर अतिथि बनाकर दुनिया को सन्देश दिया गया की भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते इतिहास के सबसे अच्छे दौर में है. फिर अमेरिका ने भी भारत के लिए अपने विदेश नीति में अहम जगह प्रदान दी. विश्व पटल पर एशिया-पैसिफिक रीजन को इंडो-पैसिफिक नाम देना अमेरिका की नजरो में भारत की बढती अहमियत को दर्शाता है. लेकिन अमेरिका के करीब भारत का आ जाना अचानक नहीं हुआ है बल्कि विश्व में ऐसी परिस्थिति पैदा हुई की अमेरिका को स्वयं भारत को अपना अहम दोस्त का तमगा देना पड़ा.

अमेरिका और चीन के मध्य सम्बन्ध खराब हैं. इसके दो कारण दक्षिणी चीनी सागर और उत्तर कोरिया हैं. दक्षिणी चीन सागर में लगातार टापुओं का निर्माण और पडोसी देशो के टापुओं पर भी अपना अधिकार जमाने की चीन की नीति अमेरिका को पसंद नही आ रही है.

दक्षिणी चीन सागर 

वंही उत्तर कोरिया और अमेरिका के सम्बन्ध सबसे बुरे दौर में हैं. और उत्तर कोरिया की चीन के साथ नजदीकी बढ़ी हैं. इनका एक कारण दोनों देशो में वामपंथी सरकार/विचारधारा होना भी है. इसके लिए चीन पर अमेरिका का दबाब है की उत्तर कोरिया से सम्बन्ध तोड़े. इसी कड़ी में उत्तर कोरिया के नजदीक मौजूद जापान, अमेरिका का साझेदार है. अमेरिका - जापान के बीच एक रक्षा करार है जिसमे हिरोशिमा-नागासाकी के नष्ट होने के बाद किसी भी युद्ध की स्थिति में जापान की अमेरिका को ही रक्षा करनी पड़ेगी. ऐसे में उत्तर कोरिया जापान के बीच युद्ध खतरा देखते हुए अमेरिका चीन पर दबाब बढ़ाना चाहता है और हाल ही में आर्थिक युद्ध (trade war) की भी शुरुआत हुई. अमेरिका के लिए अमेरिकी -चीनी रिश्तो की खटास ने इस रीजन में ऐसे साथी की जरूरत महसूस हुई जो चीन पर लगाम लगा सके. जापान आर्थिक तौर पर सम्रद्ध है लेकीन सैन्य मामलो में अमेरिका पर निर्भर है. आस्ट्रेलिया सैन्य मामलो में इस रीजन में एक पहचान है लेकिन आर्थिक तौर पर चीन का सामना नही कर सकता. और आस्ट्रेलिया-चीन दुरी भी बहुत है. ऐसे में  भारत ही एकलौता राष्ट्र है जो चीन के लिए आर्थिक और सैन्य दोनों तरफ से खतरा के रूप में उभर रहा है. भारत के चीन के साथ रिश्ते औपचारिक रूप से ही ठीक रहे हैं. तिब्बत पर कब्जे, 1962 का युद्ध और उसके बाद भी जमीनी सीमा और जल सीमा उलंघन दोनों देशो के बीच कड़वाहट बनाये हुए है.  इसलिए भारत को चीन के खिलाफ खड़ा करके अमेरिका अपने हित देख रहा है लेकिन भारत को बिना किसी शर्त पर अमेरिकी साथ मिलना बेहतर भविष्य की तरफ बढ़ते कदम हैं.
 
भारत-चीन 


इसमें कोई शक नही की अमेरिका और रूस के बीच रिश्ते कभी सामान्य नही रहे. दोनों की विश्व शक्ति हैं और "एक जंगल में दो शेर बिना लड़े नही रह सकते" वाली कहावत इन पर लागु होती है. पुराने समय से ही दोनों के बीच विवादों का अम्बार लगा हुआ है. अमेरिका को भी पता है की रूस को पीछे हटाना उसके अकेले के वश में नही है. और जब मौजूदा  परिपेक्ष्य में रूस-चीन की दोस्ती होते दिख रही है तो अमेरिका भी अपने लिए साथी की तलाश में है. और वह साथी भारत के सिवा कोई नही हो सकता. अंतर्राष्टीय स्तर पर अमेरिकी-भारतीय गठजोड़ रुसी-चीनी गठजोड़ के खिलाफ ही मुमकिन हो सका है.
"मैं हिन्दुओ को पसंद करता हूँ. मैं मोदी की बहुत इज्जत करता हूँ और उनसे मिलने को बेकरार हूँ" - ट्रम्प 

भारत - अमेरिका 

अमेरिकी दृष्टि से भले ही अमरीकी-भारतीय गठजोड़ भले ही रूस-चीन के खिलाफ हो लेकिन नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में अब भी रूस के लिए जगह है. लगातार अमेरिका से बढती नजदीकियों के बाबजूद मोदी जी ने रुसी यात्राओ में रूस को पुराना और विश्वसनीय दोस्त कहकर संबंधो को कभी कमजोर नही होने दिया. एक बार बिना एजेंडे की बैठक के लिए मोदी जी का रूस जाकर पुतिन से मिलना दर्शाता है की भारत और रूस अलग अलग नही है. हाल ही में S-400 डील करके भारत ने जता दिया की वो अब भी रूस को इतना ही महत्त्व देता है जितना पहले देता था. इस डील के मायने इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाते है जब अमेरिका ने सभी देशो को इस डील करने पर प्रतिबंध की धमकी दे रखी थी.

S-400
अमेरिका की तरफ से बार बार भारत को इस डील को कैंसिल करने की बात की गयी लेकिन भारत की विदेश मंत्री का यह बयान कि "भारत में सिर्फ भारतीय कानून चलता है किसी और देश का नही" से स्पष्ट था की आज का भारत अमेरिका के आगे सीना तानकर खड़ा है. इस डील के पक्के होने से कुछ दिन पहले अमेरिका ने चीनी सेना पर (रूस से सैन्य उपकरण खरीदे जाने के कारण) प्रतिबंध लगाकर भारत को एक सन्देश देना चाहा था की वो यह डील न करे. लेकिन जैसे ही भारत ने यह डील पक्की की तो अमेरिका ने अपने हथियार डाल दिए. दुनिया के लिए अचरज भरे निर्णय के साथ अमेरिका ने भारत के उपर प्रतिबंध लगाने से मना करते हुए अपने सम्बन्ध और पक्के करने की बात कही. यह भारतीय विदेश नीति का ही कमाल था की अमेरिका भारत के खिलाफ कदम उठाने का साहस नही कर पाया.

भारत - रूस के सम्बन्ध गर्मजोशी भरे हैं. सीरिया, अफगानिस्तान जैसे मुद्दों पर रूस ने भारत से वार्ता की है और मौजूदा भारत-चीन-पाकिस्तान गठजोड़ भले ही दिखता हो लेकिन सच्चाई यही है की पुतिन समेत किसी भी रुसी राष्ट्रपति ने कभी पाकिस्तान जाने की सोची भी नही. रूस का राष्ट्रपति पुरे दक्षिण एशिया में अगर आता है तो सिर्फ भारत.

मोदी - पुतिन

अगर बात करे जापान और आस्ट्रेलिया के साथ सम्बन्ध की तो केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से ही दोनों देशो से रिश्ते बेहतर हुए हैं. जापान हमारा पुराना व्यापारिक साझेदार है. और अब सच्चा मित्र भी. सिंजो अबे ने प्रधानमंत्री मोदी को अपना दोस्त बताया था और आजीवन भारत के साथ मित्रता की बात कही थी. जापानी प्रधानमंत्री अबे पुरे दुनिया में सिर्फ चुनिन्दा लोगो को फोलो करते हैं जिसमे एक नाम मोदी जी का भी है. भारत की अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की नीव भी जापानी प्रधानमंत्री द्वारा रखी गयी है. इस प्रोजेक्ट में जापान ने बेहद कम ब्याज पर भारी निवेश किया है. वंही भारत के पूर्वी राज्यों में निवेश के लिए जापान ही एकलौता देश है जिसे सरकार ने अनुमति दे रखी है. आस्ट्रेलिया के साथ यूरेनियम करार और संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सीट पर समर्थन दोनों भारतीय विदेश नीति की सफलता है.

भारत - जापान

ब्रिटेन एक उथल पुथल से गुजर रहा है. brexit के बाद यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन के मध्य व्यापारिक पेंच फसा पड़ा है. साथ ही अब वह इस रीजन में अलग थलग सा हो गया है. ऐसे में भारत ब्रिटेन की जरूरत है. ब्रिटेन ने भारत की UN में स्थायी सीट का समर्थन किया है. साथ ही प्रधानमंत्री मोदी उन चुनिन्दा विश्व नेताओ में शामिल हैं जिनको ब्रिटेन की महारानी ने डिनर के लिए न्योता दिया है. दोनों देशो के बीच रिश्ते गर्म जोशी के हैं.
(यूरोप यूनियन,अफ्रीका, एक्ट ईस्ट पालिसी के अंतर्गत पूर्वी देशो, मध्यपश्चिमी देशो और इजराइल-फिलिस्तीन-भारत सम्बन्ध पर नजर अगली कड़ी में. )
 
मोदी सरकार ने पिछले 4 सालो में विदेश नीति के मामले में पूर्व सरकारों की अपेक्षा सबसे अच्छा कार्य किया है. और उसका प्रभाव भारत की स्थिति पर भी दिख रहा है. सभी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर भारत की स्थिति एक ग्लोबल लीडर की है. सबसे तेज विकास दर वाला भारत पिछले 4 सालों में ही आठवे से पांचवे स्थान की अर्थव्यवस्था बन गया है.


विदेश नीति के दम पर ही भारत संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सीट के लिए मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है. विदेश नीति का ही प्रभाव है की हम रूस के साथ सीरिया पर बात करते हैं तो अमेरिका के साथ दक्षिणी चीन सागर पर भी. हमारा प्रधानमंत्री बिना किसी विदेशी ताकत के प्रेशर में आये काबुल में नाश्ता, लाहौर में लंच और दिल्ली में डिनर करने की हिम्मत रखता है. पहली बार ब्रिटेन में गार्ड ऑफ़ ऑनर मिलता है. अफ्रीका में भारत की छवि चीन के तिलिस्म को तोड़ती दिखाई देती है. जर्मनी, फ्रांस जैसे देशो को भारत में आकर निर्माण करने पर मजबूर होना पड़ता है. प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वो सबकुछ भारत को मिला जिसकी जरूरत थी और अभी कहानी जारी है...

हमारे लिए भाषा का महत्त्व


किसी भी देश के लिए उसकी भाषा उसकी पहचान और गौरव का प्रतीक होती है। भाषा उस संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होती है, जिस पर पूरी सभ्यता और समाज आधारित होते हैं। एक देश की भाषा न केवल उसकी परंपराओं और रीति-रिवाजों को बनाए रखने का एक साधन होती है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और समृद्धि का प्रतीक भी बनती है। राष्ट्र की भाषा में इतनी ताकत होती है कि वह कभी कभी राष्ट्र की एकता को बनाए रखने और सामाजिक समरसता को प्रोत्साहित करने में अहम भूमिका निभाती है। उदाहरण के लिए, दुनिया के कई देशों में भाषाओं के आधार पर संघर्ष और टकराव हुए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि भाषा सिर्फ संवाद का एक साधन नहीं, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक अस्तित्व का अहम हिस्सा बन सकती है।

विश्व के विभिन्न हिस्सों में भाषा से संबंधित संघर्षों का इतिहास रहा है। यूरोप में स्पेनिश और इंग्लिश भाषा के विवादों के कारण कई आंदोलनों ने जन्म लिया। स्पेन और इंग्लैंड के बीच हुई भिन्नताओं ने विभिन्न भाषाई पहचान को गहरा प्रभाव डाला। इसी तरह, चीन ने अपने कब्जे वाले द्वीपों पर जबरदस्ती चीनी भाषा को लागू किया, जिससे यह साबित होता है कि भाषा का विस्तार और नियंत्रण किसी राष्ट्र के अस्तित्व से जुड़ा होता है। जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस जैसे देशों में भी अपनी भाषा को प्राथमिकता दी जाती रही है, और यह देखा गया है कि इन देशों ने युद्धों के दौरान भी अपनी भाषाओं का प्रचार प्रसार किया। उदाहरण के तौर पर, जब जर्मनी ने फ्रांस के कुछ हिस्सों पर कब्जा किया, तो वहां फ्रेंच को हटाकर जर्मन भाषा को अनिवार्य कर दिया गया।

अरब देशों में अरबी भाषा का प्रमुखता से इस्तेमाल होता है, जबकि फारस (ईरान) में फारसी भाषा का ही प्रयोग होता है। इसी तरह से, मुस्लिम साम्राज्य ने जहाँ जहाँ राज किया, वहां अरबी और फारसी को अनिवार्य कर दिया था, जिससे इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार हुआ। इसी प्रकार, यूरोप में उपनिवेशों के दौरान अंग्रेजों ने भारत सहित कई देशों में अपनी भाषा अंग्रेजी को अनिवार्य किया, जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत हुई।

भारत में भाषा का महत्व

भारत में भाषा का महत्व और भी गहरा है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ विविधता में एकता का दर्शन होता है। यहाँ पर अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, लेकिन हिंदी को बहुलता के कारण प्राथमिकता दी जाती है। भारतीय संस्कृति, धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक रीतिरिवाज, और धार्मिक गतिविधियाँ अधिकांशतः हिंदी में होती हैं। यही कारण है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हिंदुत्व और भारत की पहचान बन गई है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत के अधिकतर हिस्सों में हिंदी बोली जाती है और धार्मिक अनुष्ठानों में हिंदी/संस्कृत की प्रमुखता है।

हालाँकि, भारत में कुछ दक्षिणी और पूर्वी राज्य हैं जहां हिंदी को व्यापक रूप से नहीं बोला जाता है, जैसे तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, बंगाली और अन्य भाषाएँ। लेकिन इसके बावजूद, भारतीयता और हिंदुत्व की विचारधारा में एकता बनी रहती है। इसका कारण यह है कि भारतीय भाषाएँ संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार, हालांकि भाषाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन उनका मूल संस्कृत से जुड़ा है, और यही एकता का आधार है। यह दिखाता है कि भाषा के बावजूद, भारत में एकता बनी हुई है और भारतीय संस्कृति के विचार एक हैं।

जब अंग्रेजों ने भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित किया, तब उन्होंने अंग्रेजी को भारत में शिक्षा, प्रशासन और संवाद का प्रमुख माध्यम बना दिया। आजकल भारतीय समाज का झुकाव अंग्रेजी की ओर बढ़ रहा है, और यह सच है कि हम धीरे-धीरे यूरोपीय और ईसाई संस्कृति से प्रभावित होते जा रहे हैं। हमारे खानपान, पहनावे और बोलचाल में बदलाव आ रहा है। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले कई नवयुवक गीता के बजाय बाइबल को प्राथमिकता देने लगे हैं जो यह न केवल भाषा के कारण हो रहा है, बल्कि यह हमारी मानसिकता और सोच के बदलाव का परिणाम है। आज हम अंग्रेजी में सोचने लगे हैं, और यह बदलाव हमारे सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को प्रभावित कर रहा है।

मुस्लिम समुदाय और उर्दू का प्रभाव

भारत में मुस्लिम समुदाय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उर्दू का प्रयोग करता है, जो अरबी और हिंदी का मिश्रण है। उर्दू का इतिहास इस्लाम के प्रसार से जुड़ा है, और यह भाषा भारतीय मुस्लिमों को अरबी और इस्लामी संस्कृति से जोड़ने का एक माध्यम बन गई है। जबकि हिंदी, भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व की पहचान है, उर्दू के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को अपनी पहचान और इस्लामी छवि से जोड़ने का प्रयास किया गया था। इस तरह से, उर्दू का प्रयोग भारतीय मुस्लिमों को एक विशेष सांस्कृतिक पहचान देता है, जो कभी कभी उन्हें भारतीय समाज से अलग कर सकता है।

भविष्य की दिशा

यदि हमें अपनी संस्कृति और राष्ट्रीयता को मजबूत बनाए रखना है, तो हमें हिंदी और संस्कृत की ओर लौटना होगा। हिंदी और संस्कृत का अधिक से अधिक प्रयोग भारत में सांस्कृतिक और सामाजिक एकता को बनाए रखने में मदद करेगा। साथ ही, यह भारतीयता की पहचान को सशक्त बनाएगा और भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर और भी सम्मान मिलेगा। यदि हम अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सहेजना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा की ताकत को समझते हुए उसे बढ़ावा देना होगा।

हमें यह समझना होगा कि भाषा न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि यह हमारी पहचान और गौरव का प्रतीक भी है। अगर हम अपनी भाषा और संस्कृति को छोड़कर विदेशी प्रभावों में डूबते चले गए, तो हम अपनी असली पहचान खो देंगे। इसलिए, हमें अपनी भारतीयता, हिंदुत्व और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने के लिए हिंदी और संस्कृत के महत्व को समझना होगा और उनका अधिक से अधिक प्रयोग करना होगा। तभी हम अपनी नींव को मजबूत बनाए रख सकते हैं। इन सभी बातों के इतर अपनी मातृभाषा जैसे कन्नड, तेलगु, मलयालम, मराठी आदि को भी मजबूत करना होगा। भाषाई विवाद बनाने से कई विदेशी शक्तियों को फायदा पहुंचता है इसलिए हम सभी को हिन्दी के साथ साथ अपनी अपनी मातृभाषाओं को भी मजबूत करना होगा। तीन भाषा सिद्धांत यानि एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा, एक राष्ट्रीय भाषा और एक क्षेत्रीय या मातृभाषा को अवश्य सीखना चाहिए। इसी प्रकार हम भाषाई विवाद को पीछे छोड़ एकता के सूत्र को मजबूत कर सकते हैं।   

 

गंगा जमुनी तहजीब - हकीकत


राजनीति में धर्मनिरपेक्ष होने की पहली शर्त है गंगा जमुनी तहजीब के बारे में अधिक से अधिक बार जिक्र करना, जैसे कि यह शब्द ही सेक्युलर होने की पहचान है और इस शब्द पर सेक्युलर लोगों का कॉपीराइट है। यह शब्द कब बना, कैसे बना और किस आधार पर बना, इसपर मेरी रिसर्च अधूरी है। यह भारतीय राजनीति में बीते सात दशक से, कुछ राजनीतिक दलों के लिए अमृत समान है और इसी शब्द से उनका अस्तित्व बना रहा। जैसे क्रिकेट में फील्डिंग करने वाली टीम के मुंह पर आउट शब्द रखा रहता है उसी प्रकार उन लोगो के मुंह पर यह रखा रहता है।

गंगा जमुनी तहजीब शब्द का अर्थ सभी ने अपने अनुसार बताया लेकिन ज्यादातर इसका इस्तेमाल दोनों समुदायों के साथ रहने और मिलजुलकर समाज में स्थान रखने को लेकर करते हैं। इसका अर्थ बताया जाता है कि दोनों समुदाय सुखमय रह रहे हैं परंतु राजनीतिक सेक्युलर लोग इसका विश्लेषण करते समय केवल मुस्लिम समुदाय के सुख की चिंता करते हुए देखे जा सकते हैं। एक समुदाय से गहरा लगाव आजकल धर्मनिरपेक्ष होने का भी अर्थ बन चुका है। इन राजनीतिक सेक्युलर जमात के लोगों ने ही इस शब्द को मुस्लिम तुष्टिकरण का पर्यावाची बना दिया गया है

मुस्लिमों को स्थायी वोट बैंक बनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से उनके धार्मिक मामलों को संविधान से बड़ा कर उनके नजदीक खड़ा दिखने की राजनीतिक परंपरा नें शब्दों के अर्थ को ही बदल दिया। एक ही समाज में दो अलग अलग समुदायों के साथ अलग अलग व्यवहार कर राजनीतिज्ञों नें गंगा जमुना तहजीब का जो अर्थ समाज के सामने रखा वह यही है कि अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा। आजकल अल्पसंख्यक भी उलझा हुआ शब्द है जिसकी सेक्युलर परिभाषा में बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी तो दिखते ही नहीं हैं। सारा फोकस केवल एक ही समुदाय पर रहता है जोकि इतना बड़ा है कि अल्पसंख्यक कहना भी शब्द की जान लेने जैसा है।  

गंगा एक नदी है और यमुना भी एक नदी है। दोनों ही नदियां भारत मे पूजनीय है। देश के मूलनिवासी यानि हिन्दू इनको मां या देवी मानते हैं। अब जमुनायमुना का ही अपभ्रंश है। जैसे गाँव मे जानवर को जनावर कहने वाले होते हैं उसी प्रकार यमुना को जमुना भी कई लोग कहते हैं।  अब रह गया तहजीब जोकि उर्दू का शब्द है। तहजीब मतलब संस्कारया सभ्यता। गंगा जमुनी तहजीब को लोग दो समुदाय के लोगो के मेल जोल को रेखांकित करते हुए इस्तेमाल करते हैं। आखिर ये दोनों नदियों की तहजीब यानि संस्कृति किस प्रकार हिन्दू-मुस्लिम एकता या मिली जुली संस्कृति कहलाने लगी, यह समझ से बाहर है।

अगर शाब्दिक अर्थ पर जाएँ तो इस गंगा जमुना तहजीब का हिस्सा वही होगा जिसके अंदर दोनों समुदाय के अंश मौजूद हों, शायद यही कारण है कि सेक्युलर जमात बड़े गर्व से इस शब्द को इस्तेमाल कर रहा है। इसकी जांच तो होनी ही चाहिए कि क्या असल में दोनों समुदाय के अंश लेकर ये राजनीतिज्ञ कार्य कर रहे हैं।

 

हिंदुओं की यह धरती जिसका उल्लेख पुराण में (हिमालयं समारभ्य यावत् इंदु सरेावरम् । तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्षते ।। ) हिन्दुस्थान के रूप में हुई है, अगर इसपर कोई विदेशी धर्म शरण लेता है तो भला किसी को क्या समस्या है? लेकिन विदेशी धर्म अगर छह सौ साल तक भारत पर हुकूमत करे, भारतीय संस्कृति के प्रतीकों को नष्ट करे, सभ्यता को कुचलने का प्रयास करे तो फिर उस विदेशी धर्म की भारत की धरती पर स्वीकार्यता क्यों होनी चाहिए? भारत से पाकिस्तान का बनना दोनों समुदायों के बीच संभावित संघर्ष को हमेशा से लिए मिटाने के उद्देश्य से हुआ था परंतु भारत में बंटवारे के बाद भी मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक मजबूती देने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कार्य हुआ।

अगर देश का एक हिस्सा तोड़कर अपने लिए अलग देश बना लेने वाला समुदाय, भारत में भी राजनीतिक शक्ति बनने की इच्छाशक्ति रखता हो तो उसे स्वीकार्य कर लेना भारत के भविष्य के लिए बेहतर होगा? हमारे देश के सेक्युलर जमात नें अपने वोट बैंक को स्थापित करने के लिए इन प्रश्नों पर कभी ध्यान नहीं दिया।

 इसमें कोई संदेह नहीं कि इतिहास भारतीय हिन्दू राजाओं के पराक्रम की कहानियों से भरा हुआ है। मुस्लिम शासन और फिर ब्रिटिश शासन में देश नें बहुत कुछ सहा और स्वतंत्रता मिलने के बाद पुनः देश को मजबूत करने और छत्रपती शिवाजी महाराज से प्रेरणा ले सरकार चलाने पर अगर राजनीतिज्ञों का ध्यान होता तो फिर कोई शिकायत नहीं होती। लेकिन भारत में न सिर्फ मुगलों का महिमामंडन हुआ बल्कि अपने हिन्दू राजाओं को छोटा दिखाया गया।

हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर सेक्युलर जमात क्या इतिहास के उन कटु सत्य को नकार सकता है जहां संस्कृति की रक्षा के लिए हजारों हजार लोगों ने बलिदान किया। क्या अयोध्या से लेकर पुष्कर तक मंदिरों के विध्वंश को भुलाया जा सकता है? क्या हिन्दू समाज भूल सकता है औरंगजेब के अत्याचार और टीपू सुल्तान का जेहाद। स्वतंत्रता बाद नरेटिव गढ़ने के लिए अकबर महान को गढ़ा गया और महाराणा को हल्दीघाटी में हारा हुआ बताया गया। इतिहास का पुनरलेख्न ऐसे हुआ जिससे विदेशी धर्म प्रभावी हो सके और हमारी अपनी युवा पीढ़ी अपने ही इतिहास से शर्म महसूस करे।  

मुस्लिम काल भारत में करीब छह सौ साल रहा। इस दौरान भारत वर्ष में हिन्दू राजा अलग अलग स्थानों पर अलग अलग तरीके से मुस्लिमों से लड़ते रहे। ध्यान देने वाली बात यह है कि मुस्लिमों ने ये छह सौ साल मजे से बैठकर नही गुजारे बल्कि हिन्दुओं से भयंकर प्रतिरोध लगातार चलता रहा। पहले राजपूतविजयनगरफिर मराठासिख – जाटबुन्देलउत्तर पूर्व व सुदूर दक्षिण आदि स्थानों पर मुस्लिमों को लगातार युद्ध लड़ने पड़े। इस समय मुस्लिमों ने हिन्दुओं को लेकर कोई शालीनता नही दिखाई और न ही तब हिन्दू मुस्लिम एकता जैसा कुछ था। गंगा जमुना तहजीब भी उस समय सुनाई नही देती थी। भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने का एक एजेंडा था जोकि खलीफा के शासन के अंदर लाने के एजेंडे के साथ था। इसके बाद ब्रिटिश काल में भी कुछ ख़ास नही बदला। ब्रिटिश लोगों को भारतीय जनमानस से प्रतिरोध मिला लेकिन मुस्लिम लोगों ने कुछ खास दिलचस्पी नही दिखाई। मुस्लिम राजाओं ने अंग्रेजों से लड़ाई सिर्फ इसीलिए लड़ी क्योकि उनको राज प्यारा था। न भारत की स्वतंत्रता से कोई उन्हें मतलब था न ही भारत जैसा कोई देश का विचार उस समय मुस्लिमों में था। मुस्लिमों ने केवल अंग्रेजी सरकार का विरोध तब किया जब तुर्की के खलीफा को अंग्रेजो ने हटा दिया। सही मायने में मुस्लिम काल से लेकर ब्रिटिश काल तक स्वतंत्रता की लड़ाई को हिन्दुओं ने ही अपने कंधो पर उठाया।

अंग्रेजी काल में जो हुआ सो हुआ लेकिन आज़ादी मिलने के बाद जो लोग सत्ता में बैठे उन्हें न भारत के लोगों की आस्था से कोई मतलब था न ही भारतीय संस्कृति के प्रति उन्हें श्रद्धा थी। दुर्भाग्य का विषय है कि भारत का प्रथम प्रधानमन्त्री एक नास्तिक था और शिक्षा मंत्री मुस्लिम। इसी कारण न सिर्फ भारत को बांटकर मुस्लिमों को अलग देश दे दिया गया साथ ही बचे भारत को तथाकथित सेक्युलर राष्ट्र बनाने का निर्णय लिया। हालाँकि संविधान में सेक्युलर शब्द नही जोड़ा गया था लेकिन भारत का प्रधानमन्त्री सेक्युलर था। उसे हिन्दू आन-मान-शान से कोई लेना देना नही था। जिस हिन्दुस्थान को जीतने के लिए मुस्लिमों को 400 वर्ष लग गये उस भारत में अपनी ही सरकार हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे (सही मायने में मुस्लिम तुष्टिकरण)को लेकर आई।

यह दीर्घकालिक सत्य है कि हिन्दू मुस्लिम भाईचारा कभी भी सम्भव नही है। हिन्दू हिन्दू भाईचारा तो सम्भव हैमुस्लिम-मुस्लिम भाईचारा तो सम्भव है लेकिन हिन्दू –मुस्लिम कभी नही। ऐसा कहने के पीछे भी एक कारण है। हिन्दुओं और मुस्लिमों में वैचारिक दुरी इतनी अधिक है कि दोनों में समानता कभी नही हो सकती। इसी को लेकर सावरकर ने कहा था कि भाई-चारा स्थापित करने के लिए दो शर्ते हैंजबतक ये शर्तें पूरी नही होंगी भाईचारा कभी स्थापित हो ही नही सकता।

पहला है रक्त का सम्बन्ध – कोई दो समुदाय या पंथ अगर एक रक्त के हैं तो वो एक साथ रह सकते हैं। इसका अर्थ एक पूर्वज से है। इस दृष्टि से अगर भारत में हिन्दू मुस्लिम एकता लानी है तो भारत के मुस्लिम लोगों को यह न सिर्फ स्वीकार करना होगा कि वे हिन्दुओं से ही बने हैं साथ ही उन्हें हिन्दू पूर्वजों के प्रति सम्मान भी व्यक्त करना होगा।  

दूसरी शर्त है कि इस भारत को पूजनीय मानना। हिन्दुओ के लिए यह भारत ही स्वर्ग से बढकर है। यहीं उनके भगवान जन्मेयहीं उनकी आस्था है। भारत के बाहर कहीं भी हिन्दुओं के लिए कोई देश इतना बढकर नही जिसे वो भारत से ज्यादा सम्मान दें। यानि अपना देश ही हिन्दुओं के लिए महत्त्व का है। जबकि मुस्लिमों और ईसाईयों के साथ ऐसा नही है। मुस्लिमों के लिए भारत इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है कि वो यहाँ सैकड़ों वर्ष से रह रहे हैंलेकिन उनकी आस्था सऊदी अरब की धरती के लिए हमेशा रही है और रहेगी। इसी प्रकार ईसाई-यहूदी भी इजराइल की तरफ आस्था रखते हैं। जब तक यहाँ रहने वाले मुस्लिम विदेशी धरती के प्रति अपनी आस्था को समाप्त नही करते और भारत की धरती को ही सर्वोच्च नही मानते तब तक हिन्दुओं का उनके साथ भाईचारा हो ही नही सकता। ऐसा कहने के लिए इतिहास के कई उदाहरण हमारे सामने है।

एक बार तुर्की ने अपने देश में रह रहे ईसाईयों को इसलिए अपना नागरिक स्वीकार कर लिया क्योकि भले ही वो उस समय ईसाई थे लेकिन उससे पहले तो वो सब तुर्की मुस्लिम ही थे। मतलब ईसाईयों की हालत आज के भारतीय मुस्लिमों जैसे ही थी। तुर्की ने बड़ा दिल दिखाते हुए ईसाईयों को बराबर समझा लेकिन जब तुर्की का युद्ध पड़ोस के ईसाई देश के साथ हुआ तो तुर्की मुस्लिमों के साथ खून का रिश्ता रखने वाले ईसाई अपनी आस्था के कारण तुर्की के साथ नही रह पाए। और ईसाई सेना की तुर्की टुकड़ी पड़ोसी ईसाई देश में आ मिली।

सिर्फ यही नही बल्कि अमेरिका – जर्मनी में तनाव के बीच अमेरिका में रह रहे हजारों जर्मन लोग जोकि अमेरिकन बन चुके थे उनके अंदर भी स्थायित्व नही आया और आखिरकार जर्मनी का ही साथ उन्होंने दिया। भारत में सिखबोद्ध भले ही अलग धर्म के तौर पर हों लेकिन उनकी आस्था इसी भारत में है और रक्त भी हिन्दुओं से मिलता है इसलिए भाईचारा उनके साथ स्थापित हो सकता है। भारत में यही कारण रहा कि जब तुर्की के खलीफा को गद्दी से ब्रिटिश लोगों ने उतार दिया तो भारत में टर्की से हजारों किलोमीटर दूर लाखों मुसलमान सडकों पर उतर आया। यह आस्था के कारण था।

इसलिए भारत में जितनी कोशिशे इस तथाकथित भाईचारे को बनाने में हुए हैं वो सब बेकार गयी हैंआगे भी जाएगी। इस भाईचारे का एक ही मार्ग है – यहाँ रह रहे सभी मुस्लिमों का यह मान लेना की भारत की भूमि से बढकर कुछ नही। ऐसा करने से मुस्लिमों और हिन्दुओं में एकता आ जाएगी भले ही फिर रीति रिवाज मुस्लिम न बदलें।

गंगा जमुनी तहजीब उसी प्रकार भ्रम बनाता है जिस प्रकार अभी तक एक समुदाय के हित को ही प्राथमिकता देने को धर्मनिरपेक्षता समझा गया। यह शब्द अपने आप में फर्जी शब्द है। यह शब्द एक समुदाय का बहुसंख्यकों पर प्रभावी होने के लिए बनाया गया है। यह इतिहास के रक्त रंजीत भागों को दबाने और फर्जी तथ्य गढ़ने को लेकर बनाया गया है।

सड़क रोक कर पढ़ी जाने वाली नमाज पर कोई आपत्ति करे तो उसे दिखा दिया जाता है गंगा जमुनी तहजीब बचाने का रास्ता जोकि चुप रहने का एक संदेश है। बहुसंख्यक सहने के लिए ही बना है, यह तथ्य यह शब्द तैयार कर रहा है। प्लेसज ऑफ वर्शिप ऐक्ट जैसा असंवैधानिक कानून भी इसी गंगा जमुनी तहजीब की देन है।

गाय के प्रति श्रद्धा रखने वाला बहुसंख्यक अगर उनके गाय बचाने के लिए कहे तो अवश्य ही वह गंगा जमुनी तहजीब से लिए खतरा है। अजान से ध्वनि प्रदूषण और नींद खराब होने की शिकायत कि जाए या किसी मुस्लिम मोहल्ले में पूजा करना, दोनों ही गंगा जमुनी तहजीब के लिए खतरा हैं। महिलाओं पर धर्म के आधार पर छेड़छाड़ होती है और यह मामले उन जगह अत्यधिक हैं जहां अल्पसंख्यक बड़ी मात्रा में हैं। हरियाणा के मेवात, बिहार का सीमावर्ती क्षेत्र, बंगाल, पश्चिमी उत्तरप्रदेश आदि वो क्षेत्र हैं जहां स्टडी कर गंगा जमुनी तहजीब का अर्थ समझा जा सकता है।

कश्मीर में आजतक जो आतंकवाद पनपता रहा, उसके पीछे भी सत्ता में बैठे सेक्युलर जमात के यही विचार हैं। आतंकवादियों पर रहम क्योंकि वो एक विशेष समुदाय से हैं। कश्मीर से हिंदुओं का पलायन कोई पुरानी घटना तो नहीं है।  सिर्फ कश्मीर ही क्यों? पूरे भारत में 2014 से पहले आतंकवाद की इतनी घटनाएं हुईं। आगजनी और तोडफोड आम बात थी।  ये सब इसी शब्द के कारण था।

 

मुस्लिम संगठन बनाए जा सकते हैं, धर्म प्रचार और धर्मपरिवर्तन करने की छूट दी जा सकती है लेकिन हिन्दू संगठनों को सांप्रदायिक घोषित कर दिया जाना, इसी गंगा जमुनी तहजीब का हिस्सा है। वेद ,पुराण सब झूठ से भरा है। यह अंधविश्वास है, जबकि कुरान आसमान से उतरी या कुरान में जो लिखा है सब सच है, यह मानना ही गंगा जमुनी तहजीब है। काबा में शैतान बन्द है, ईद पर बकरागायऊंटभैंस आदि की कुर्बानी से अल्लाह खुश होता है लेकिन शिवलिंग पर दूध चढ़ाना अंधविश्वास और बेवकूफी है। हदीसों का पालन करना चाहिए लेकिन उपनिषद ब्राह्मणवाद है। दलित बेचारे हैं और इनपर ब्राह्मणों ने अत्याचार किया है जबकि शिया सुन्नी बरेलवी अहमदिया जैसे नामों पर बटा पड़ा इस्लाम जिसमे सभी एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं, यह तथ्य छुपाना ही गंगा जमुनी तहजीब है। एक तरफ हज सब्सिडी तो दूसरी तरफ अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमले, ये भी गंगा जमुनी तहजीब का हिस्सा था। कुलमिलाकर एक बड़ी साजिश के साथ रचा गया यह झूठ शब्द आज भी प्रचलित है जिसका खंडन होना ही चाहिए।  

 

 


पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नागपुर प्रस्थान


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर में तृतीय वर्ष प्रशिक्षण वर्ग में प्रणब मुखर्जी को मुख्यातिथि के रूप में संघ द्वारा बुलाया जाना भारतीय राजनीतिज्ञों के लिए एक विशिष्ट घटना थी। संघ विचारधारा का विरोध करने वाली कॉंग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी जोकि आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति बने, उनके एक कदम नें कॉंग्रेस पार्टी को भी चिंतित कर दिया। राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल शुरू तो कॉंग्रेस राज में हुआ परंतु उनके कार्यकाल में ही कॉंग्रेस सत्ता का सूर्य अस्त  हो चुका था और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का उदय हो चुका था। उनके संबंध प्रधानमंत्री मोदी से काफी मधुर रहे और जिस टकराव का अंदाजा कॉंग्रेस पार्टी की चाह थी वह संभव न हुआ। पूर्व राष्ट्रपति के रूप में भी प्रणब मुखर्जी नें अपने विचार स्पष्ट रूप से रखे और यही कारण था कि संघ के बुलावे को न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि वो नागपुर संघ कार्यालय भी गए।

संघ का संवाद हमेशा खुला होता है और राजनीतिक मतभेद से प्रभावित नहीं होता। संघ नें समय समय पर ऐसे वक्ताओं को आमंत्रित किया जोकि संघ को सार्वजनिक जीवन में कभी स्वीकार नहीं करते। संघ ऐसे मंच पर भी जाने में गुरेज नहीं करता जहां उसके विचारों के विरोधी हों। लेकिन संघ के प्रति अन्य लोगों का व्यवहार संकुचित रहा और यही कारण प्रणब मुखर्जी के संघ कार्यालय जाने का विरोध हुआ और उनको भी न जाने का अनुरोध कॉंग्रेस पार्टी ने किया।  

भारत में भाजपा और संघ का विरोध करने वाले केवल दो गुट हैं, एक जोकि इस्लामिक विचारों के प्रति कट्टर हैं और दूसरे कम्युनिस्ट। ये दोनों ही संवाद के सभी मंचों पर केवल स्वयं को स्थापित करना चाहते हैं। संघ और भाजपा दोनों को ही मंच न देने कि लगातार कोशिश हुई। यह जानना आवश्यक है कि आखिर ये दोनों विचारधाराएं संघ के प्रति इतना संकुचित क्यों हैं? एक मंच पर बहस करने में इन्हें डर क्यों लगता है?

संघ कहता है कि वह व्यक्तित्व देखता है न कि उसके राजनीतिक कार्य और जो व्यक्ति देश को प्रथम रखता है वह संघ के लिए सम्मानित है। शायद इसीलिए संघ विभिन्न पार्टियों के विभिन्न नेताओं से मिलता रहता है। लेकिन विरोधी यह समझने के लिए भी तैयार नहीं कि संघ भारतीय समाज को प्रतिनिधित्व कर रहा है। संघ के प्रति यह नफरत हिंदुओं के प्रति काँग्रेस कि उदासीन सोच के कारण भी है। आजादी के तुरंत बाद संघ को बदनाम करने कि चाल चलने वाले जवाहरलाल नेहरू व्यक्तिगत जीवन में हिन्दू आस्था से कितना जुड़े थे, उनके कार्य और पुस्तकें दोनों बता देती हैं।   अपनी पुस्तक "भारत: एक खोज" में उनकी लिखी लाइन की "गंगा मेरे लिए सिर्फ एक नदी है, माँ नही" से साफ जाहिर होता है कि वो किस विचार के व्यक्ति थे। पंडित नेहरू और उनके आसपास कम्युनिस्ट विचारों वाले सलाहकार, दोनों ने भले ही हिन्दुत्व विचारों को प्रतिबंधित करने के यत्न किए हों परंतु भारत चीन युद्ध में संघ के कुशल प्रदर्शन और सेना की  सहायता के लिए अभूतपूर्व कार्य के लिए प्रधानमंत्री नेहरू को मजबूरन संघ को गणतंत्र दिवस समारोह के लिए आमंत्रित करना पड़ा। संघ नें देश के लिए अपना कर्तव्य तब भी निभाया और देश के लिए यह आमंत्रण स्वीकार किया।

लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री रहते भारत-पाक युद्ध के समय कैबिनेट बैठक में जिसमे सैन्य अधिकारी, सुरक्षा एजेंसी अधिकारी भी शामिल थे, उसमें संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी को भी बुलाया और उन्होंने बैठक में हिस्सा भी लिया।

इन सबके बीच एक बात और गंभीरता पूर्वक सोचनी चाहिए कि कुछ कॉंग्रेसी नेता आखिर प्रणब जी का विरोध क्यों कर रहे हैं। सबसे पहली बात की वो किसी एक दल के नेता नही रहे, अब वो पूर्व राष्ट्रपति हैं इसलिए उनकी मर्जी जहां जाए। दूसरी बात कि अगर वो काँग्रेस के नेता भी हैं तो भी क्या काँग्रेस को प्रणब मुख़र्जी जैसे व्यक्ति को संदेह की निगाह से देखना चाहिए। क्या कांग्रेस को प्रणब जी पर कोई शक है कि कहीं वे भी शाखा में नियमित जाना शुरू न कर दें। संघ में तो ऐसी सोच नही है। अगर उसके कोई भी अधिकारी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से ही व्यक्तिगत क्यों न मिल रहे हों, तब भी संघ तो कभी नही सोचते कि कहीं वो अधिकारी काँग्रेस ज्वाइन करने की तो नही सोच रहा। वे तो यही कहेंगे कि  सम्भवतः राहुल जी को कोई मार्गदर्शन की जरूरत हुई होगी या उन्हें संघ के बारे में जानने की इच्छा हुई होगी। कोई भी स्वयंसेवक अपने अधिकारी के बारे में कभी भी संदेह प्रकट नही करेगा। लेकिन आज कांग्रेस के नेता जिस प्रकार से शोर कर रहे हैं उससे यही पता चलता है की उन्हें प्रणब जी पर विश्वास नही है।

खैर... सभी आलोचनाओ को मुँह तोड़ जबाब देते हुए प्रणब जी का नागपुर जाना और बिना मांगे सलाह देने वालो को दुत्कारना, उनके बड़े व्यक्तिव को दर्शाता है। उनके सम्बोधन का विश्लेषण भी मीडिया ने किया। उनके सम्बोधन में कहीं भी वैचारिक विरोध नजर नहीं आया बल्कि लगा कि वे संघ को समझ चुके हैं। संघ कार्यालय परिसर में जाकर हेडगेवार जी की मूर्ति पर श्रद्धासुमन अर्पित करना, तत्पश्चात उनके पैतृक आवास जोकि अब एक म्यूजियम है उसका अवलोकन करना, दर्शाता है कि प्रणब मुखर्जी ने उस स्थान व संघ के कार्यों को सराहा है,

प्रणब मुखर्जी का व्यक्तित्व निश्चित ही पार्टी लाइन से बड़ा है। अगर कॉंग्रेस भी उनसे सीखना प्रारंभ करले तो शायद उसका राजनीतिक पतन इतनी जल्दी नहीं हो। विरोधी स्वर को भी सुनने कि क्षमता जोकि कॉंग्रेस के पास नहीं है, उसी का खामियाजा है कि आंतरिक रूप से कमजोर यह पार्टी राजनीति में हाँसीए पर जा रही है। कम्युनिस्ट और इस्लामिक कट्टरता, केवल यही दो गुट काँग्रेस में हावी हैं और केवल उन्हीं इशारों पर पार्टी चल रही है। प्रणब मुखर्जी जैसे वरिष्ठ नेताओं का विरोध किया जाना, उन्हें आरएसएस का गुलाम बताए जाना और मोदी का गुलाम जैसी संज्ञा दिए जाने से पता चलता है कि कॉंग्रेस नैतिक रूप से कितना गिर चुकी है। वह दिन दूर नहीं जब कॉंग्रेस से बड़े चेहरे गायब हो जाएंगे और केवल एक परिवार मात्र इस पार्टी में रह जाएगा। वह दिन भी जल्द आने वाला है।   

 

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History of Mother's Day : मदर्स डे का इतिहास

भारत का पश्चिमीकरण एक गंभीर समस्या है एवं यह सिर्फ रहन-सहन, खान-पान और कपड़ों से आगे बढ़ परंपराओं और त्यौहारों तक जा पहुंचा है। हालांकि भारतीय समाज विश्व के सभी तत्वों को आत्मसात करने और अपने अनुकूल ढालने में संकोच नहीं करता और न ही अन्य देशों की तरह प्रतिबंध लगाकर विचारों के प्रवाह को रोकता है।  कई बार पश्चिमी परंपराओं का निर्वहन करते करते हम स्वयं के विचारों को कुदृष्टि से देखने लगते हैं और यहाँ से शुरू होता है स्वयं पर अविश्वास। विदेशी परम्पराएं, त्यौहार आदि भारत के लिए खतरा नहीं हैं जबतक हम अपने स्वयं के परंपराओं और त्यौहारों को न भूलने लगें या स्वयं को कम आँकने लगें।

सोशल मीडिया के इस युग में एक समस्या यह भी है कि पश्चिमी से विचार इस प्रकार भारतीय दिमाग पर हावी होते हैं कि हमको उन विचारों को समझने और जानने का समय ही नहीं मिलता। पश्चिम से आया फेमिनिज़म भारत में पनपने लगा परंतु इसके पीछे के कारण और इसके शुरू होने कि वजह से आज भी भारतीय युवा पीढ़ी अपरिचित है।   

अवसर Mother's Day का है और मेरा प्रयास मदर्स डे से युवाओं को परिचित कराने का है। अमेरिका से शुरू हुआ यह त्यौहार मूलतः कैथोलिक ईसाइयो का है। यह दिन वर्जिन मैरी को समर्पित है। वर्जिन मेरी ईसाई धर्म से जुड़ा किरदार है। 'एना जार्विसने इस धार्मिक त्यौहार को थोड़ा बदला। ग्रीस में भी एक त्यौहार मेट्रोनलिया जो जूनो को समर्पित थामनाया जाता था। यह ग्रीक देवताओ को समर्पित था। यह यूरोप में मदर्स दे का सबसे मूल उद्भव था।



पश्चिमी दुनिया में महिलाओं नें काफी लंबे समय तक भेदभाव और शोषण का जीवन व्यतीत किया है। न ही उनके पास अधिकार थे, न समाज में पुरुषों के बराबर हक। प्राचीन एथेंस में जोकि पश्चिमी सभ्यता का उद्गम है, वहाँ स्त्रियों को गुलाम व शारीरिक शोषण के लिए खरीदा व बेचा जाता था। प्राचीन ग्रीस में तो बुरा हाल था ही लेकिन आधुनिक यूरोप में भी महिलाओं को समान अधिकार के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। वोट देने के अधिकार के लिए एक लंबा आंदोलन हुआ।  कुलमिलाकर महिलाओं की इस निम्न स्थिति के कारण और परिणामस्वरूप हुए महिलाओं के संघर्ष के कारण समाज में काफी परिवर्तन हुए और यही एक कारण था कि समय के साथ मदर्स दे में महिलाओं का जुड़ाव हो गया और त्यौहार स्त्री केंद्रित हो गया।  इसी कारण शुरुआत में यह त्यौहार जो सिर्फ और सिर्फ वर्जिन मैरी से सम्बंधित था उसे बीसवीं सदी में एना जार्विस ने आसपास की महिलाओं को उपहार देनेखाना खिलाने व् सम्मान देने का अवसर बना दिया।

एना जार्विस के बाद यह महिलाओं के जगह केवल माँ तक सीमित हो गया और इसका प्रचलन तब ज्यादा बढ़ जब इस  त्यौहार का व्यवसायीकरण हुआ। बाजार से खरीदे गए ग्रीटिंग कार्ड को भेंट में देनाबाजार से तरह तरह के गिफ्ट खरीदकर महिलाओं को देने जैसे कार्य लोग करने लगे। बढ़ता बाजारीकरण देखकर ऐना जार्विस ने इस त्यौहार को समाप्त करने का प्रयास किया और मदर्स दे का विरोध किया।

 मदर्स दे आज पश्चिमी दुनिया और विशेषकर ईसाई देशों में मनाया जाता है जोकि उसी बाजारीकरण के सिद्धांतों से प्रचलित किया जाता है। हालांकि अलग अलग देशों जैसे भारत में जब यह त्यौहार आया तो समाज नें अपने अनुसार अपनाया और मौजूदा स्वरूप हमारे सामने है। हम इसको माँ के सम्मान से जोड़कर देखते हैं और एक ऐसे दिन के रूप में मनाते हैं जोकि माँ के लिए समर्पित है। हमने अपने मूल विचारों को जोकि माँ के प्रति श्रद्धा और सम्मान देना सिखाते हैं, उनका उपयोग कर इस त्यौहार को अपना लिया परंतु बाजारीकारण हमारे समाज में भी हावी हो रहा है।  

मदर्स डे यानि माँ का दिन, वह दिन जो माँ के लिए समर्पित है, अलग अलग देशों में अलग अलग परंपराओं अनुसार मनाया जाता है। यानि हर समाज में यह परंपरा रही है लेकिन उन्होनें पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण नहीं किया।

ईरान में मुहम्मद की बेटी फातिमा का सालगिरह 20 जुमादा अल-ठानी को मनाया जाता है। यह ईरानी क्रांति के बाद बदल दिया गया थाइसका कारण नारीवादी आंदोलनों के सिद्धांतों को हटा कर पुराने पारिवारिक आदर्शों के लिए आदर्श प्रतिरूप को बढ़ावा देना था। जापान में प्रारम्भ में मातृ दिवस जापान में शोवा अवधि के दौरान महारानी कोजुन (सम्राट अकिहितो की मां) के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता था।

नेपाल में बैशाख महीने के कृष्ण पक्ष में अमावस्या के दिन पड़ने वाले माता तीर्थ औंशी त्यौहार जीवित और स्वर्गीय माताओं के स्मरणोत्सव और सम्मान में मनाया जाता हैजिसमें जीवित माताओं को उपहार दिया जाता हैं तथा स्वर्गीय माताओं का स्मरण किया जाता हैं। नेपाल की परंपरा में माता तीर्थ की तीर्थयात्रा पर जाना प्रचलित हैं जो काठमांडू घाटी में स्थित हैं। प्राचीन समय में भगवान श्री कृष्ण की मां देवकी प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए घर से बाहर निकल गईं । उन्होंने कई स्थानों का दौरा किया और घर लौटने में बहुत देर कर दी। भगवान कृष्ण अपनी मां के न लौटने पर दुखी हो गए। वे अपनी मां की तलाश में कई स्थानों पर घूमते रहे परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। अंत मेंजब वह "माता तीर्थ कुंड" पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनकी मां तालाब के फुहार में नहा रही हैं। इस कहानी से भी यह त्यौहार जोड़ा जाता है। भगवान कृष्ण और उनकी माँ से मिलन कर कारण यह स्थान एक पवित्र तीर्थयात्रा बन गया हैं जहां श्रद्धालु एवं भक्तगण अपनी स्वर्गीय माताओं को श्रद्धा अर्पण करने आते हैं।

थाईलैंड में मातृत्व दिवस थाइलैंड की रानी के जन्मदिन पर मनाया जाता है। ब्रिटेन में मदर्स दे ऐतिहासिक क्रूर घटनाओं पर आधारित है जब नबलिगों को मजदूर बना कर रखा जाता था। कई बार चर्च भी मजबूरन बच्चों को धार्मिक शिक्षा देते थे ,साथ में मजदूरी भी करवाते थे और माँ बाप से मिलने नही देते थे। बाद में साल का एक दिन माँ से मिलने के लिए निश्चित किया गया और यही वहाँ मदर्स दे बना। भारत में माँ को समर्पित अनगिनत त्यौहार, परम्पराएं हैं जबकि हमने अमेरिका के मदर्स दे जोकि मई के दूर रविवार को मनाया जाता हैको भी अपना लिया।

मई के दूसरे रविवार को मनाए जाने वाले इस मदर्स डे को उचित कहना कितना ठीक है और कितना गलत, यह आँकलन हम स्वयं कर सकते हैं। प्रश्न यह भी है कि क्या परंपराओं का निर्वहन पश्चिमी चश्मे से किया जाना ठीक है। वर्ष में एक दिन मातृ दिवस मनाने वाला हमारा समाज वर्ष के अन्य दिनों में भी माँ को वहीं सम्मान देना न भूले, यह भी आवश्यक है। भारत की सभी परम्पराएं, वृत एवं त्यौहार मातृशक्ति से जुड़े होते हैं और वर्ष में अनेक दिन इसी को याद कराते हैं कि स्त्रियों का सम्मान हमारी परंपरा का अभिन्न अंग है। अगर हम चाहें तो मई के दूसरे रविवार को इतना महत्व न देकर अपने परंपरागत दिनों पर भी माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शन व सम्मान देने का दिवस मना सकते हैं।