किसी
भी देश के लिए उसकी भाषा उसकी पहचान और गौरव का प्रतीक होती है। भाषा उस संस्कृति
का अभिन्न हिस्सा होती है, जिस पर पूरी सभ्यता और समाज
आधारित होते हैं। एक देश की भाषा न केवल उसकी परंपराओं और रीति-रिवाजों को बनाए
रखने का एक साधन होती है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और
समृद्धि का प्रतीक भी बनती है। राष्ट्र की भाषा में इतनी ताकत होती है कि वह कभी
कभी राष्ट्र की एकता को बनाए रखने और सामाजिक समरसता को प्रोत्साहित करने में अहम
भूमिका निभाती है। उदाहरण के लिए, दुनिया के कई देशों में
भाषाओं के आधार पर संघर्ष और टकराव हुए हैं, जो यह दर्शाते
हैं कि भाषा सिर्फ संवाद का एक साधन नहीं, बल्कि एक सामाजिक
और राजनीतिक अस्तित्व का अहम हिस्सा बन सकती है।
विश्व
के विभिन्न हिस्सों में भाषा से संबंधित संघर्षों का इतिहास रहा है। यूरोप में
स्पेनिश और इंग्लिश भाषा के विवादों के कारण कई आंदोलनों ने जन्म लिया। स्पेन और
इंग्लैंड के बीच हुई भिन्नताओं ने विभिन्न भाषाई पहचान को गहरा प्रभाव डाला। इसी
तरह,
चीन ने अपने कब्जे वाले द्वीपों पर जबरदस्ती चीनी भाषा को लागू किया,
जिससे यह साबित होता है कि भाषा का विस्तार और नियंत्रण किसी
राष्ट्र के अस्तित्व से जुड़ा होता है। जापान, फ्रांस,
जर्मनी, रूस जैसे देशों में भी अपनी भाषा को
प्राथमिकता दी जाती रही है, और यह देखा गया है कि इन देशों
ने युद्धों के दौरान भी अपनी भाषाओं का प्रचार प्रसार किया। उदाहरण के तौर पर,
जब जर्मनी ने फ्रांस के कुछ हिस्सों पर कब्जा किया, तो वहां फ्रेंच को हटाकर जर्मन भाषा को अनिवार्य कर दिया गया।
अरब
देशों में अरबी भाषा का प्रमुखता से इस्तेमाल होता है, जबकि फारस (ईरान) में फारसी भाषा का ही प्रयोग होता है। इसी तरह से,
मुस्लिम साम्राज्य ने जहाँ जहाँ राज किया, वहां
अरबी और फारसी को अनिवार्य कर दिया था, जिससे इस्लाम धर्म का
प्रचार प्रसार हुआ। इसी प्रकार, यूरोप में उपनिवेशों के
दौरान अंग्रेजों ने भारत सहित कई देशों में अपनी भाषा अंग्रेजी को अनिवार्य किया,
जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत हुई।
भारत
में भाषा का महत्व
भारत
में भाषा का महत्व और भी गहरा है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ विविधता में एकता का
दर्शन होता है। यहाँ पर अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, लेकिन
हिंदी को बहुलता के कारण प्राथमिकता दी जाती है। भारतीय संस्कृति, धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक रीतिरिवाज, और धार्मिक गतिविधियाँ अधिकांशतः हिंदी में होती हैं। यही कारण है कि
हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हिंदुत्व और भारत की पहचान
बन गई है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत के अधिकतर हिस्सों में हिंदी
बोली जाती है और धार्मिक अनुष्ठानों में हिंदी/संस्कृत की
प्रमुखता है।
हालाँकि, भारत में कुछ दक्षिणी और पूर्वी राज्य हैं जहां हिंदी को व्यापक रूप से
नहीं बोला जाता है, जैसे तमिल, तेलुगू,
कन्नड़, मलयालम, बंगाली
और अन्य भाषाएँ। लेकिन इसके बावजूद, भारतीयता और हिंदुत्व की
विचारधारा में एकता बनी रहती है। इसका कारण यह है कि भारतीय भाषाएँ संस्कृत से
उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार, हालांकि भाषाएँ अलग-अलग हैं,
लेकिन उनका मूल संस्कृत से जुड़ा है, और यही
एकता का आधार है। यह दिखाता है कि भाषा के बावजूद, भारत में
एकता बनी हुई है और भारतीय संस्कृति के विचार एक हैं।
जब
अंग्रेजों ने भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित किया, तब
उन्होंने अंग्रेजी को भारत में शिक्षा, प्रशासन और संवाद का
प्रमुख माध्यम बना दिया। आजकल भारतीय समाज का झुकाव अंग्रेजी की ओर बढ़ रहा है,
और यह सच है कि हम धीरे-धीरे यूरोपीय और ईसाई संस्कृति से प्रभावित
होते जा रहे हैं। हमारे खानपान, पहनावे और बोलचाल में बदलाव
आ रहा है। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले कई नवयुवक गीता के बजाय बाइबल को
प्राथमिकता देने लगे हैं जो यह न केवल भाषा के कारण हो रहा है, बल्कि यह हमारी मानसिकता और सोच के बदलाव का परिणाम है। आज हम अंग्रेजी
में सोचने लगे हैं, और यह बदलाव हमारे सांस्कृतिक और
राष्ट्रीय पहचान को प्रभावित कर रहा है।
मुस्लिम
समुदाय और उर्दू का प्रभाव
भारत
में मुस्लिम समुदाय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उर्दू का प्रयोग करता है, जो अरबी और हिंदी का मिश्रण है। उर्दू का इतिहास इस्लाम के प्रसार से
जुड़ा है, और यह भाषा भारतीय मुस्लिमों को अरबी और इस्लामी
संस्कृति से जोड़ने का एक माध्यम बन गई है। जबकि हिंदी, भारतीय
संस्कृति और हिंदुत्व की पहचान है, उर्दू के माध्यम से
मुस्लिम समुदाय को अपनी पहचान और इस्लामी छवि से जोड़ने का प्रयास किया गया था। इस
तरह से, उर्दू का प्रयोग भारतीय मुस्लिमों को एक विशेष
सांस्कृतिक पहचान देता है, जो कभी कभी उन्हें भारतीय समाज से
अलग कर सकता है।
भविष्य
की दिशा
यदि
हमें अपनी संस्कृति और राष्ट्रीयता को मजबूत बनाए रखना है, तो हमें हिंदी और संस्कृत की ओर लौटना होगा। हिंदी और संस्कृत का अधिक से
अधिक प्रयोग भारत में सांस्कृतिक और सामाजिक एकता को बनाए रखने में मदद करेगा। साथ
ही, यह भारतीयता की पहचान को सशक्त बनाएगा और भारत को
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर और भी सम्मान मिलेगा। यदि हम अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक
विरासत को सहेजना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा की ताकत को
समझते हुए उसे बढ़ावा देना होगा।
हमें
यह समझना होगा कि भाषा न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि
यह हमारी पहचान और गौरव का प्रतीक भी है। अगर हम अपनी भाषा और संस्कृति को छोड़कर
विदेशी प्रभावों में डूबते चले गए, तो हम अपनी असली पहचान खो
देंगे। इसलिए, हमें अपनी भारतीयता, हिंदुत्व
और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने के लिए हिंदी और संस्कृत के महत्व को समझना
होगा और उनका अधिक से अधिक प्रयोग करना होगा। तभी हम अपनी नींव को मजबूत बनाए रख
सकते हैं। इन सभी बातों के इतर अपनी मातृभाषा जैसे कन्नड, तेलगु, मलयालम, मराठी आदि
को भी मजबूत करना होगा। भाषाई विवाद बनाने से कई विदेशी शक्तियों को फायदा पहुंचता
है इसलिए हम सभी को हिन्दी के साथ साथ अपनी अपनी मातृभाषाओं को भी मजबूत करना होगा।
तीन भाषा सिद्धांत यानि एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा, एक राष्ट्रीय भाषा और एक क्षेत्रीय
या मातृभाषा को अवश्य सीखना चाहिए। इसी प्रकार हम भाषाई विवाद को पीछे छोड़ एकता के
सूत्र को मजबूत कर सकते हैं।