अर्नब गोस्वामी के खिलाफ षड्यंत्र

 



भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। सभी को अपने विचार रखने की आजादी है हालाँकि संविधान में दी गयी इस आजादी की परिभाषा सभी अपने अपने हित को देखकर करते हैं। आजादी के बाद धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ और एक नया देश पाकिस्तान ने जन्म लिया हालाँकि जिस टकराव को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए पाकिस्तान बनाया गया, वो समाप्त नही हुआ। भारत हिन्दू बहुल होने के बाबजूद मुस्लिम परस्त सत्ताधारियों को सहता रहा। देश के पहले शिक्षामंत्री एक मुस्लिम को बनाकर उस एजेंडे की पटकथा लिखना शुरू हुआ जिसमें अगर किसी को झुकना था तो वो सिर्फ हिन्दुओं को।

तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु द्वारा तमाम ऐसे फैसले लिए गये जोकि मुस्लिम वर्ग को ध्यान में रखकर लिए गये चाहे उसमें सोमनाथ मन्दिर पुनर्निर्माण का विरोध हो, कश्मीर मामला हो, हैदराबाद और जूनागढ़ रियासतों का विलय हो। नेहरु के प्रधानमंत्री रहते देश में वामपंथी षड्यंत्रों की शुरुआत हुई जिसमें देश की शिक्षा व्यवस्था से वो सब बातें निकाल कर फ़ेंक दी गयी जो भारत की वैभवता और श्रेष्ठता को सिद्ध करती हों। इसके साथ ही पुस्तकों में भर दिया गया वो जहर जो धीरे धीरे भारत को ही खत्म करने लगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु द्वारा शिक्षा व्यवस्था को वामपंथियों के हाथ में देने का परिणाम यही हुआ कि किताबों में महराणा प्रताप हल्दीघाटी का युद्ध हार गये, अकबर महान हो गया, शिवाजी छापामार युद्ध तक सिमित हो गये, टीपू सुल्तान देशभक्त हो गया, ताजमहल प्रेम की निशानी बन गया, श्री राम काल्पनिक हो गये, इस्लाम कश्मीरियत बन गया और मूल कश्मीरी लोग यानी कश्मीरी हिन्दू निर्वासित हो गये। महाभारत-रामायण मायीथोलोजी बन गये, पैगम्बर शांति के प्रतीक हो गये, पांच हजार वर्ष से चले आ रहे राज परिवार गुम हो गये, मुगल ही इतिहास की पुस्तक हो गये, औरंगजेब रहनुमा बन गया, कबीर संत हो गये, कश्मीर अलगाववाद का दूसरा नाम बन गया, दिल्ली मुगलों की हो गयी, पृथ्वीराज चौहान गायब हो गये, सोमनाथ तोड़ने वाले मुहम्मद गौरी का गाँव सबको पता चल गया, मन्दिर तोड़ने का बदला लेने वाले राजा भोज विलुप्त हो गये। अर्थशास्त्र देने वाले चाणक्य का देश समाजवादी हो गया, बीस हजार से ज्यादा वर्षों का लिखित इतिहास रखने वाला देश पिछड़ा हो गया, दुनिया की सबसे महान संस्कृति धर्मनिरपेक्ष हो गयी, गीता का संदेश फिजूल हो गया, कुरान और पुराण बराबर हो गये, गले में चर्च का क्रॉस फैशन हो गया, मन्दिर की बात करना कम्युनल हो गया, मस्जिदों में आतंकी तैयार करना सेक्युलर हो गया, गुरुकुल खोलना और बनाना प्रतिबंधित हो गया, सरकरी फंड पर मदरसा चलाना व्यवस्था का अंग हो गया, पुजारी ब्राह्मणवाद का प्रतीक बनकर अंधविश्वासी हो गये, मौलाना और मौलवी सरकारी पेंशन के हकदार हो गये, पर्दा प्रथा हिन्दुओं पर कलंक हो गयी और मुस्लिमों में नुताह, हलाला, ट्रिपल तलाक पर बात करना असंवैधानिक हो गया। हिन्दू ग्रंथों की बात करना मनुवाद हो गया, दलित उत्पीडन के नाम पर प्रतिबंधित हो गया जबकि शरीयत पर चलने वाली शरीयत अदालतें मुस्लिमों का अंदरूनी मामला हो गया। बंगाल बंगलादेश हो गया और फिर असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल बंगलादेशियो के हो गये, केरल भगवान का प्रदेश हो गया हालाँकि भगवान को मानने वाले हिन्दू 50% हो गये। मन्दिरों का पैसा सरकार का और मस्जिदों-चर्चों का पैसा उन्ही का हो गया। पाकिस्तान में 1947 से पहले मौजूद सभी मन्दिर मस्जिद बन गये और भारत में मन्दिर तोड़कर बनाई गयी सभी मस्जिदें अब भी वक्फ बोर्ड की हैं। राम सेतु तोड़ने का फैसला होने लगा, दंगे में बहुसंख्यक दंगे से पहले ही आरोपी बनने लगा। नेहरु के प्रधानमंत्री रहते जो कार्य हुए उसने भारत से उसका हिंदुत्व मिटाने के लिए हर सम्भव प्रयास किये और इसमें भी शांति न मिली तो उनकी बेटी इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाकर संविधान में सेक्युलर शब्द ठूंस दिया। कुलमिलाकर जितना नुकसान हमने इस मुस्लिम परस्त नीतियों का जोकि अक्सर धर्मनिरपेक्ष नीति के नाम से प्रचलित हैं, का सहा वो बताता है कि देश के साथ कितना बड़ा षड्यंत्र हो रहा था।

हालाँकि अँधेरा हटा, कोहरा छटा, कमल खिला और 2014 में राष्ट्रवादी और हिन्दू हित की बात करने वाले लोग सत्ता पर बैठे। इसके बाद 7 दशकों का षड्यंत्र विफल करने का कार्य प्रारम्भ हुआ। वामपंथियों और इसाई मिशनरीज के हाथों से उत्तर पूर्व राज्यों को बचाना शुरू हुआ और देखते देखते सातों राज्यों में भगवा लहर गया। त्रिपुरा से 25 साल तक जमे बैठे वामपंथियों को उखाड़ फ़ेंक दिया गया और असम में भी करारी शिकस्त देकर राष्ट्रवादी सरकार बनी। कश्मीर को स्वायत्त या पाकिस्तान का हिस्सा बनाकर इस्लामिक रियासत का सपना पाल रहे लोगों को बर्बाद करने का कार्य सम्पन्न हुआ और 5 अगस्त 2019 को कश्मीर से धारा 370 हटाकर कश्मीरी झंडे और संविधान को फाड़कर फ़ेंक दिया गया। भारत विरोधी स्टैंड लेने वाले हर एक व्यक्ति को एक साल तक नजरबंद रखकर बता दिया कि भारत की जमीन पर रहकर साजिश करोगे तो भारत सरकार छोड़ने वाली नही। यह राष्ट्रवादियों के सत्ता पर आने के कारण ही हुआ कि देश का गृह मंत्री सभी बंगलादेशी और रोहिंग्याओं को चेतावनी भरे लहजे में कह देता है कि उनका भारत में रहना अब ज्यादा नही चलने वाला और हर कीमत पर NRC लागु होगा। देश के अंदर जहाँ जहाँ इस्लामिक साजिश के कारण घाव थे वहां मरहम भी लगा और कारण भी मिटाया गया। देश को सांस्कृतिक आजादी दिलाने के मिशन के साथ अयोध्या से दशकों पुराना पड़ा मलबा साफ़ करके भव्य राम मंदिर की नीवं भारत के प्रधानमंत्री ने रखी। जिस प्रधानमंत्री कार्यालय से श्री राम को काल्पनिक बताया गया उसी प्रधानमंत्री कार्यालय से श्री अयोध्या से श्री लंका तक राम वन पथ गमन योजना के अंतर्गत विकास का खाका तैयार हुआ।

इन पिछले छह वर्षों में हर उस जगह सफाई अभियान चला जहाँ राजनीतिक रूप से इस्लामिक और वामपंथी अतिक्रमण स्थायी रूप लेने लगा था। स्वयं को हिन्दू कहने से घृणा करने वाले लोग धर्म के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने लगे। हिन्दुओं पर थोपे जा रहे कानूनों का विरोध जो सत्ता द्वारा होना था, हुआ ! साथ ही समाज ने मजबूत होकर कुछ लोगों के एजेंडा को सफल नही होने दिया। पहले 5 साल में जिस प्रकार कार्य केंद्र सरकार ने किया उससे तमाम संस्थानों की नीव हिल गयी जो मुस्लिम तुष्टिकरण के साथ हिन्दू हित पर चोट करते रहे हैं और भारत को अंदरूनी तौर पर खोकला करने की साजिस में लगे थे। वामपंथियों, इस्लामिक संगठनों, इसाई मिशनरीज को मिलने वाला विदेशी धन का स्त्रोत पहचानकर आर्थिक मदद केंद्र सरकार ने रोकी तो इन सब के सामने करो या मरो की स्थिति उत्पन्न हो गयी। जिस प्रकार सांप के सिर पर लाठी का प्रहार सांप की आक्रामकता को बढ़ा देता है उसी प्रकार इस इस्लामिक-मिशनरीज-वामपंथी गठबंधन ने देश पर अंतिम प्रहार करने के लिए सक्रियता बढाई।  सन 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में पुरे भारत में सिर्फ दो गुट थे। एक तरफ राष्ट्रवादी और दूसरी तरफ बाकि सब जिन्होंने इस देश को सत्ता में रहकर, संस्थानों में रहकर, समाजसेवी संगठन बनाकर, मानव अधिकारों की संस्था की शक्ल लेकर, अंतर्राष्ट्रीय मंच बनकर, और हिन्दुओं के भेष में सेक्युलर बनकर इस देश की व्यवस्था को चोट पहुँचाने का कार्य किया।

इतिहास में जाएँ तो प्लासी का युद्ध वो युद्ध था जिसमें भारत की मुख्य सैन्य ताकतें एक साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी थी। कुछ इसी प्रकार राष्ट्रवादियों और हिन्दू हित की बात करने वालों के खिलाफ विशाल गठबंधन तैयार हुआ। जनता जागरूक थी, लोग अपना हित जानते थे, पूर्वजों के पूण्य साथ थे और महान संस्कृति का गौरव दिलो में था जिससे षड्यंत्र विफल हुआ और फिर से प्रचंड बहुमत से सत्ता में राष्ट्रवादी आ गये।

इस बड़ी हार के बाद मिशनरीज-इस्लामिक-वामपंथी गठबंधन के स्वरूप में अलगाववादी ताकतों की कमर टूट गयी। इस हार से उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया और अंतिम संयुक्त हमला करने की साजिश बनाई। हालाँकि इस बीच भारत में लोगों का सच्चाई स्वीकार करने का प्रचलन बढ़ गया। सात दशक से सेक्युलर नाम का चोला पहनने पर मजबूर किये जाने के प्रयास विफल होने के बाद समाज ने भी सेक्युलर एजेंडे को फ़ेंक दिया और स्वयं की संस्कृति, धर्म और इतिहास पर गर्व की अनुभूति की। रामायण का प्रसारण हुआ तो विश्व के सभी रिकॉर्ड टूट गये जिसने बता दिया कि भारतवासी फिर से अपनी जड़ों से जुड़ने को तैयार हैं। सांस्कृतिक जागरण का समाज में आना, राष्ट्र का उस चिर निद्रा से जागना है जिसमें रहकर यह राष्ट्र अपना तेज खो रहा था।

अब जिस प्रकार भारत एक सैन्य शक्ति के रूप में, आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। जिस प्रकार भारत के लोग दुसरे देशों में मुख्य पदों पर आसीन हो रहे हैं। जिस प्रकार विश्व में डिसिजन टेकिंग ग्रुप में भारत का प्रभुत्व बढ़ा है, विश्व राजनीती में भारत का दखल बढ़ा है, उससे एक गुट भारत के खिलाफ तैयार हो रहा है। यह गुट अकेले कोई कार्य नही कर सकता इसलिए इसको उन लोगों की मदद लेनी पड़ेगी जो भारत के अंदर रहकर मौके की तलाश कर रहे हैं। जिनकी अंतिम साँस बस टूटने ही वाली है वो लोग अंतिम युद्ध लड़ने की तैयारी में है। भारत के विश्वविद्यालयों में, सरकारी संस्थानों में, फिल्म इंडस्ट्री में, समाजसेवी संगठनों में, मानवाधिकारों की संस्थाओं में, आर्थिक-सामाजिक स्तर पर कार्य करने वाली संस्थाओं में, राजनीतिक दलों में यानी हर जगह एक ऐसी लॉबी है जो इसी मौके के इंतजार में है कि वर्तमान सत्ता नेतृत्व को कमजोर किया जाये। हालाँकि जैसा बताया कि इनकी रणनीति बदली है। ये लोग हर उस व्यक्ति को, संस्था को, संस्थान को निशाना बनायेंगे जोकि राष्ट्रवादी विचारों के साथ है। वर्तमान में इस लॉबी का सबसे बड़ा निशाना है अर्नब गोस्वामी।

भारत के अंदर मीडिया बहुत बड़ी इंडस्ट्री है। इसमें स्क्रीन पर दिखने वाले चेहरों के पीछे अनेकों चेहरे हैं जोकि अपना एजेंडा चला रहे हैं। आज का भाग्य कहें या दुर्भाग्य लेकिन यह सच है कि देश का माहौल तैयार करने में मीडिया चैनलों की बड़ी भूमिका है। सत्ता पर राष्ट्रवादियों के आसीन होते ही मीडिया में छुपकर कार्य कर रहे हिन्दू विरोधी मानसिकता के लोगों का एक्स्पोज होना शुरू हो गया था। धीरे धीरे गंदगी या तो खत्म हो गयी या उसने स्वयं को बचाने के लिए रूप बदल लिया। आपने देखा होगा कुछ स्वयंभू पत्रकार अब चैनल छोड़कर अपना यूट्यूब चैनल बना लिए हैं। हालाँकि जैसा प्रकृति का नियम है कि हर चीज अपना विस्तार करती है तो वही भारत में हुआ। पहले सत्ता में जब अटल विहारी वाजपेयी आये तो उनके भी राष्ट्रवादी विचार थे लेकिन किस प्रकार खुलकर वो बोलते थे या नही, वो हम सब जानते हैं। उनके कार्यों में, फैसलों में निडरता थी लेकिन बड़े फैसले वो भी नही ले पाए। समय के साथ राष्ट्रवाद का पेड़ बड़ा हुआ और नरेंद्र मोदी जैसा नेता इसका संरक्षक बना। नरेंद्र मोदी शासनकाल में फैसलों में निडरता भी रही, और बड़े बड़े फैसले भी लिए गये। वर्तमान में मोदी नेतृत्व ही है इसलिए इसका विस्तार होना अभी बाकि है लेकिन हम योगी आदित्यनाथ के रूप में यह अंदेशा लगा सकते हैं कि फैसलों में निडरता, उसके बाद निडरता के साथ बड़े फैसले लेना, और अब उसके बाद आक्रामकता भी आने वाली है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते योगी आदित्यनाथ ने जिस प्रकार कार्य किया है उससे शत्रु भयभीत हैं। कुछ इसीप्रकार परिस्थिति मीडिया में भी बदली। शुरुआत में सत्ता के प्रति नरमी मीडिया ने दिखाई। फिर उसके बाद विपक्षियों को एक्स्पोज करना शुरू किया। इस्लामिक-मिशनरीज-कम्युनिस्ट गठबंधन की सच्चाई दिखाना शुरू किया और पूर्ववर्ती सरकारों के फैसलों की समीक्षा करनी शुरू हुई। वर्तमान में मीडिया में राष्ट्रवाद का यही रूप है। इस विरोधी गठबंधन में मीडिया के प्रति गुस्सा इसीलिए है और गोदी मीडिया नाम से पुकारा जाने लगा है। हालाँकि भविष्य में यह वृक्ष कितना बड़ा होगा वो तो नही पता लेकिन रिपब्लिक को देखकर हम भविष्य का अंदेशा लगा सकते हैं। रिपब्लिक ने आक्रामकता दिखाना शुरू कर दिया है। वो खबरों तक नही बल्कि खबरों के कारण पर चोट कर रहा है। वर्तमान में बीजेपी विरोधी पार्टी अगर कहीं गठबंधन में सफल हैं तो वो महाराष्ट्र ही है और सफल गठबंधन के एकलौते इस राज्य की सत्ता पर रिपब्लिक ने बड़ा हमला किया है। सुशांत आत्म्हत्याकाण्ड हो या पालघर साधू हत्याकांड, दोनों में किसी चैनल ने आक्रामकता दिखाई तो वो रिपब्लिक था। भारत को इस आक्रामकता की जरूरत भी है। जब रिपब्लिक ने इस मामले को उठाकर तेजी से अपना प्रसार किया तो इस गठबंधन के निशाने पर रिपब्लिक ही आया। मीडिया का सलीका, पत्रकारिता की परिभाषा और एनक्रिंग करने का तरीका सीखाने वाले कई लोग सामने आये और रिपब्लिक को कोसा। हालाँकि मीडिया के लिए कोई एक तरीका इस्तेमाल करने का कोई नियम नही है लेकिन कुछ लोगों के पेट में दर्द है। यह पहली बार है जब दुसरे चैनल यह कह रहे हों कि एक खास चैनल पत्रकारिता नही कर रहा बल्कि नौटंकी करता है। क्या भारत के अंदर कोई व्यक्ति किस प्रकार चैनल चलाएगा, यह कोई एक संस्था तय करेगी? हालाँकि अगर किसी चैनल का कंटेंट देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाता है और उसपर करवाई करने की कोशिश सरकार करती है तो वो अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा एवं मीडिया पर खतरा का मुद्दा बन जाता है लेकिन जब एक न्यूज़ चैनल के खिलाफ सारे न्यूज़ चैनल खड़े हो जाएँ सिर्फ इसलिए कि वो अपनी बात को आक्रामकता से रखता है तो क्या मीडिया पर खतरा नही है? सबसे बड़ी बात है कि रिपब्लिक की डिबेट में अक्सर गेस्ट के साथ दुर्व्यवहार किया जाने का आरोप लगाया जाता है। मुझे समझ नही आता कि यह कैसा दुर्व्यवहार है कि गेस्ट सुनता रहता है और एक डिबेट के बाद फिर अगले दिन डिबेट में भी आ जाता है लेकिन पेट में दर्द और अपमान दुसरे लोगों को फील होता है। खैर.. रिपब्लिक पर हमले हुए, अलग अलग केस में चैनल को घसीटा जा रहा है। TRP मामले में भी चैनल का नाम आया है। अभी बजाज और पारले जी द्वारा एक फैसला लिया गया है और वो फैसला है कि ये दोनों कम्पनी इस चैनल को ऐडवरटाईजमेंट नही देंगी क्योकि ये चैनल समाज को जहर परोस रहे हैं। यहाँ सभी को इस फैसले के पीछे का कारण समझना होगा। सबसे बड़ी बात यही कि आखिर किस जहर की बात हो रही है? साधुओं की हत्या पर मौन तोड़ने की बात कहने वाला रिपब्लिक जहर फैला रहा है क्या? या साधुओं की हत्या के पीछे मिशनरीज बताना जहर फैलाना है? अगर रिपब्लिक की रिपोर्टिंग में झूठ है और उससे देश में शांति और देश की सुरक्षा खतरे में है तो केन्द्रीय मंत्रालय एक्शन लेता। या फिर स्वतः संज्ञान लेने वाली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट रिपब्लिक को नोटिस भेज देती। लेकिन ऐसा नही हुआ फिर यह कैसे इन कम्पनी को लगा कि रिपब्लिक जहर फैला रहा है। दरअसल अभी दो घटनाओं को हमें समझना होगा उसके बाद यह समझ आ जायेगा कि किस प्रकार रिपब्लिक की रिपोर्टिंग इन दोनों कम्पनियों को जहर लग रही है। पहली घटना है NBA के अध्यक्ष रजत शर्मा का बयान। दरअसल NBA वो एजेंसी है जो न्यूज़ चैनलों को मोनिटर करती है और उनके कंटेंट से जुड़ी शिकायतों पर एक्शन लेती है। इस NBA का सदस्य रिपब्लिक नही हैं। अर्नब गोस्वामी ने बहुत पहले अपनी अलग संस्था बना ली थी जिसकों पचास के लगभग चैनलों का समर्थन साथ में केन्द्रीय मंत्रालय का समर्थन प्राप्त है। अब रिपब्लिक के दोनों हिंदी और अंग्रेजी चैनल TRP में न।1 स्थान पर हैं। दुसरे चैनलों को इससे परेशानी होना स्वभाविक है इसलिए NBA ने यह अपील की थी कि ऐसे चैनलों को एडवरटाईजमेंट कम्पनियां न दें जो NBA का हिस्सा नही हैं। इसका मतलब बायकाट करने का प्लान NBA ने ही रखा ताकि बिना पैसे के ये चैनल न चल पायें। मुंबई पुलिस ने भी TRP मामले में रिपब्लिक के खातों को फ्रीज़ करने की कोशिश की थी ताकि पैसे रोककर चैनल रोका जा सके। अब दूसरी घटना है कि बजाज के मालिक का बयान जोकि भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था को लेकर आया था। आप ऑनलाइन देख सकते हैं। दरअसल बजाज का मालिक उसी मानसिकता से ग्रस्त है या उसी लॉबी का हिस्सा है जिससे राष्ट्रवादियों को लड़ना है। वर्तमान केंद्र सरकार के खिलाफ बजाज का बयान आते रहते हैं।



 दूसरी तरफ पार्ले जी ने भी यह कहा था कि उसकी बिक्री घट रही है ताकि देश में बड़ा आर्थिक संकट होने की बात को बल मिल सके। हालाँकि बाद में पता चला कि पार्ले जी की बिक्री बढ़ गयी है जिससे आर्थिक संकट वाला झूठ नही चला। खैर इन दोनों कम्पनियों का चरित्र हम देख चुके हैं। यहाँ पर एक बड़ी बात सोचने वाली है कि पूंजीपति लोग अगर इस प्रकार मीडिया को प्रभावित करने लगे तो क्या मीडिया निष्पक्ष हो पायेगा? वैसे आज का विपक्ष मीडिया पर हमले का आरोप लगाता है साथ ही सरकार पर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाता है। लेकिन आज जब दो बड़ी कम्पनी सीधे सीधे यह कहते हुए विज्ञापन नही देती कि आपको कंटेंट बदलना होगा तो क्या यह पूंजीपतियों द्वारा मीडिया पर हमला नही है? आज कुछ लोग इस खबर पर ताली बजा रहे हैं लेकिन वो भूल रहे हैं कि ऐसा करके वो सत्ता में बैठे लोगों को ही मौका दे रहे हैं। अगर कल को कुछ इसी प्रकार का पलटवार हुआ तो क्या होगा?  रिपब्लिक पर एक और केस हुआ है और वो हुआ है मुंबई स्थित फिल्म प्रोडक्शन हाउसेस की तरफ से। यानी पूरा बॉलीवुड रिपब्लिक के खिलाफ उतर आया है।

इससे साफ पता चलता है कि हर तरफ से यह इस्लामिक-वामपंथी-मिशनरीज गठबंधन रिपब्लिक पर हमला कर रहा है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार प्लासी के युद्ध में हारने के बाद भारत में सभी सैन्य शक्तियों ने मिलकर बक्सर के मैदान में अंग्रेजों से युद्ध लड़ा था। बक्सर का युद्ध इतिहास की प्रमुख घटना है क्योकि इसका परिणाम अंग्रेज भारत में रहेंगे या नही रहेंगे, यह तय करने वाला था। बक्सर के युद्ध में सारी शक्तियाँ एक हो गयी थीं। कुछ इसी प्रकार सभी तरफ से रिपब्लिक पर हमले जारी हैं। हालांकि इसी बीच लव जिहाद को बढ़ावा देने वाला तनिष्क ज्वेलर के विज्ञापन पर लोगों का गुस्सा निकला है और जमकर विरोध हुआ। कम्पनी ने न सिर्फ विज्ञापन वापस लिया, माफ़ी मांगी और 2700 करोड़ का नुकसान भी कराया। अब देखना होगा कि समाज जब इतना संगठित और मजबूत है, राष्ट्रवादी लहर प्रबल है ऐसे में ये सभी लोग मिलकर रिपब्लिक को हरा पाते हैं या नही। हालाँकि यह अंतिम हमला है राष्ट्रवादियों पर और इसलिए राष्ट्रवादियों को भी इस अंतिम युद्ध को मिलकर लड़ना होगा।   


वियतनाम में हिन्दू संस्कृति के सबूत


अभी कुछ दिन पहले पूर्वी एशिया के देश वियतनाम से चौकाने वाली खबर आई। दरअसल वियतनाम में भारतीय पुरातत्व विभाग (अर्कोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) द्वारा खुदाई हुई जिसमें एक विशाल शिवलिंग निकला। धरती में निकले इस शिवलिंग से न सिर्फ पूरी दुनिया का ध्यान वंहा गया बल्कि वियतनाम और अन्य पूर्वी एशिया के देशों के बीते इतिहास को भी खंगाला जाने लगा। हिन्दू संस्कृति के पुराने इतिहास के जीवंत साक्ष्य के रूप में जमीन से निकली यह शिवलिंग न सिर्फ इतिहास को बयाँ करती है बल्कि भारत में अब तक पेश की जाती रही तमाम मिथ्या और षड्यंत्र पर आधारित थ्योरी को नकारती है। सबसे पहले हम वियतनाम के वर्तमान और उसके इतिहास में जानेंगे। उसके बाद एक-एक करके हर उस कड़ी को जोड़ेंगे जो न सिर्फ वियतनाम का गौरवशाली इतिहास है बल्कि भारत का भी इतिहास रहा है।

वियतनाम दक्षिण एशिया में Indo-china नाम से जाना जाने वाले भाग में सबसे पूर्वी किनारे पर स्थित एक देश है। चीन, कम्बोडिया और लाओस का पड़ोसी वियतनाम दक्षिणी चीन सागर पर बसा है। वियतनाम में करीब 85 % लोग बोद्ध हैं। जनसंख्या की दृष्टि से यह चीन और जापान के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बौद्ध देश है। वर्तमान में करीब 08% लोग इसाई हैं। यंहा हिन्दू बहुत कम या नामात्र हैं। हालाँकि कुछ गाँव में आज भी वो लोग हैं जो हिन्दू हैं। यंहा देशी धर्म के लोग भी हैं यानि अपने स्वयं के देवी-देवताओं और आत्माओं आदि की पूजा करने वाले। हमारे यंहा स्कूल में अक्सर वियतनाम का इतिहास पढ़ाया जाता है। इसके नेता हो ची मिन्ह और इन्ही के नाम पर इसकी राजधानी के बारे में हम अक्सर पढ़ते हैं। वैसे तो वियतनाम का इतिहास बहुत पुराना है लेकिन आधुनिक इतिहास देखें तो 938 ई। में चीन से अलग होकर स्वतंत्र देश बन गया। इसमें इसके बाद कई राजवंशों का शासन रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्रांस का परतंत्र हो गया ठीक वैसे ही जैसे हम ब्रिटिश लोगो के थे। वियतनाम ने आज़ादी की लड़ाई की समाप्ति के साथ अपने को दो हिस्सों में बंटते हुए देखा है। दो अलग अलग राजनीतिक रूप में बंट जाने के कारण हुआ गृह युद्ध 1975 में उत्तरी वियतनाम के विजय के साथ समाप्त हुआ।

अब बात करते हैं वियतनाम के पुराने इतिहास की। यह पुराना इतिहास हिन्दू राजाओं, राजवंशो और परम्पराओं से भरा पड़ा है। दरअसल इस्लाम, बौद्ध, इसाई धर्म से पहले विश्व में जहाँ भी मानव सभ्यता मौजूद थी वो या तो अपने स्थानीय रीती रिवाजों को मानती थी या हिन्दू धर्म को। जंगलों में रहने वाले आदिवासी तब प्राकृतिक रूप से प्राप्त ज्ञान के आधार पर ही जीवन व्यतीत करते रहते थे। गाँव व् शहरों के रूप में उन्नत मानव जाति एक तय धार्मिक परम्पराओं को मानती थी। प्राचीन काल में भारत हिन्दू संस्कृति का मुख्य केंद्र रहा। दूसरी जगहों पर हिन्दू संस्कृति बनी रही लेकिन उनका भारत से लगातार सम्पर्क रहा। इसीलिए हमारे भविष्यपुराण और अन्य पुराण में विश्व के भौगोलिक स्थिति का हजारों वर्ष पहले का वर्णन मौजूद है। उस समय कितने समुन्द्र, कितने महाद्वीप, कितने और कहाँ पर्वत चोटियाँ हैं, इन सबकी जानकारी थी। भारतीय महाद्वीप से अलग विश्व में जहाँ भी मानव सभ्यता थी तब वहां अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग देवताओं को मानने वाले लोग होते थे।अगर सभी सभ्यताओं को गौर से स्टडी करें तो देखते हैं कि भगवान शिव हर सभ्यता में कॉमन रहे हैं। यही कारण है कि प्राचीन वियतनाम में देखें, चीन में देखें, ईरान, इराक, ग्रीस, अरब और मिस्त्र इजिप्ट में भी शिव लिंग मिलते रहे हैं। प्राचीन वियतनाम में सबसे ज्यादा नाम चम्पा लोगों का आता है। वियतनाम पहले चम्पा नाम का देश हुआ करता था।

म्पा का इतिहास

चम्पा दक्षिण पूर्व एशिया (पूर्वी Indo-china Region (हिन्दचीन) (192-1832) में) स्थित एक प्राचीन हिन्दू राज्य था। यहाँ भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार था और इसके राजाओं के संस्कृत नाम थे। चम्पा के लोग और राजा शैव थे। शैव यानी भगवान शिव को पूजने वाले। वर्तमान समय में चाम लोग वियतनाम और कम्बोडिया के सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं। हिन्दू धर्म ने सदियों से चम्पा साम्राज्य की कला और संस्कृति को आकार दिया है। उनके रीतिरिवाजों पर, वास्तुकला पर, परम्पराओं में हिन्दू धर्म मिलता है। 10 शताब्दी में इस्लाम लेकर अरब व्यापारी वहां पहुंचे और इस्लाम को फैलाना शुरू किया। अपने हिन्दू पहचान के प्रति शायद चम्पा के लोग भी सजग न रहे और इसीलिए आज, कई चाम लोग इस्लाम का पालन करते हैं। वहां धर्मांतरण 10 वीं शताब्दी में शुरू हुआ, और 17 वीं शताब्दी तक समाज के अभिजात वर्ग ने भी पूरी तरह इसे अपना लिया। कनवर्टेड मुस्ल्लिम को अब बानी चाम कहा जाता है (अरबी के शब्द बानू से)। हालाँकि, आज भी वहाँ बालामोन चाम (संस्कृत के ब्राह्मण से उत्पन्न) हैं जो अभी भी अपने हिंदू विश्वास और रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और त्योहार मनाते हैं। बालामोन चाम दुनिया में केवल दो जीवित गैर-इंडिक (भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर के) स्वदेशी हिंदू लोगों में से एक है, जिसकी संस्कृति हजारों साल पुरानी है। इनके अलावा इंडोनेशिया के बाली द्वीप के लोग भी हिंदू धर्म का पालन करते हैं।

राजवंशी इतिहास

धर्म महाराज श्री भद्रवर्मन जिसका नाम चीनी इतिहास में फन-हु-ता (380-413 ई।) मिलता है, चंपा के प्रसिद्ध सम्राटों में से है जिसने अपनी विजयों ओर सांस्कृतिक कार्यों से चंपा का गौरव बढ़ाया। किंतु उसके पुत्र गंगाराज ने सिंहासन का त्याग कर अपने जीवन के अंतिम दिन भारत में आकर गंगा जी के तट पर व्यतीत किए। फन यंग मैं (चीनी नाम) ने 420 ई। में गंगाराज की अनुपस्थिति के कारण बनी अव्यवस्था का अंत कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया। यंग मैं द्वितीय के राजकाल में चीन के साथ दीर्घकालीन युद्ध के अंत में चीनियों द्वारा चंपापुर का विध्वंस हुआ। इस वंश का अंतिम शासक विजयवर्मन था जिसके बाद (529 ई।) में गंगाराज का एक वंशज श्री रुद्रवम्रन शासक बना। 605 ई। में चीनियों का फिर से विध्वंसकारी आक्रमण हुआ। अव्यवस्था का लाभ उठाकर राज्य की स्त्रीशाखा के लोगों ने 645 ई। में प्रभासधर्म और सभी पुरुषों की हत्या कर अंत में 657 ई। में ईशानवर्मन को सिंहासन दिलाया जो कंबुज नरेश ईशानवर्मन का दोहित्र था। 757 ई। में रुद्रवर्मन् द्वितीय की मृत्यु के साथ इस वंश के अधिकार का अंत हुआ।

पृथिवीन्द्रवर्मन के द्वारा स्थापित राजवंश की राजधानी चंपा ही बनी रही। इसकी शक्ति दक्षिण में केंद्रित थी और यह पांडुरंग अंश के नाम से प्रख्यात था। 854 ई। के बाद विक्रांतवर्मन तृतीय के बिना संतान मरने पर सिंहासन भृगु अंश के अधिकार में चला गया जिसकी स्थापना इंद्रवर्मन् द्वितीय अथवा श्री जय इंद्रवर्मा महाराजाधिराज ने की थी। इस अंश के समय में वास्तविक राजधानी इंद्रपुर ही था। भद्रवर्मन् तृतीय के समय में विदेशों में भी चंपा का शक्तिशाली और महत्वपूर्ण राज्य के रूप में गौरव बढ़ा। उसके विद्वान् पुत्र इंद्रवर्मन् के राज्यकाल  में 944 और 947 ई। के बीच कंबुज नरेश ने चंपा पर आक्रमण किया। 972 ई। में इंद्रवर्मन् की मृत्यु के बाद लगभग सौ वर्षो तक चंपा का इतिहास अभी अज्ञात है। इस काल में अन्नम ने, जिसने १०वीं शताब्दी में अपने को चीन के निंयत्रण से स्वतंत्र कर लिया था, चंपा पर कई आक्रमण किए जिनके कारण चंपा का आंतरिक शासन छिन्न भिन्न हो गया। 989 ई। में एक जननायक विजय श्री हरिवर्मन ने अव्यवस्था दूर कर विजय में अपना राज्य स्थापित किया था। उसके परवर्ती विजयश्री नाम के नरेश ने विजय को ही अपनी राजधानी बनाई जिसे अंत तक चंपा की राजधानी बने रहने का गौरव प्राप्त रहा। जयसिंहवर्मन् द्वितीय के राज्य में 1044 ई। में द्वितीय अन्नम आक्रमण हुआ। किंतु छ: वर्षों के भीतर ही जय परमेश्वरवर्मदेव ईश्वरमूर्ति ने नए राजवंश की स्थापना कर ली। उसने संकट का साहसर्पूक सामना किया। पांडुरंग प्रांत में विद्रोह का दमन किया, कंबुज की सेना को पराजित किया, शांति और व्यवस्था स्थापित की और अव्यवस्था के काल में जिन धार्मिक संस्थाओं को क्षति पहुँची थी उनके पुनर्निर्माण की भी व्यवस्था की। किंतु रुद्रवर्मन् चतुर्थ को 1069 ई। में अन्नम नरेश से पराजित होकर तथा चंपा के तीन उत्तरी जिलों को उसे देकर अपनी स्वतंत्रता लेनी पड़ी। चम इस पराजय का कभी भूल न सके और उनकी विजय के लिये कई बार प्रयत्न किया।

अव्यवस्था का लाभ उठाकर हरिवर्मन् चतुर्थ ने अपना राज्य स्थापित किया। उसने आंतरिक शत्रुओं को पराजित कर दक्षिण में पांडुरंग को छोड़कर संपूर्ण चंपा पर अपना अधिकार कर लिया। उसने बाह्य शत्रुओं से भी देश की रक्षा की और अव्यवस्था के कारण हुई क्षति और विध्वंस की पूर्ति का भी सफल प्रयत्न किया। परम बोधिसत्व ने 1085 ई। में पांडुरंग पर अधिकार कर चंपा की एकता फिर से स्थापित की। जय इंद्रवर्मन् पंचम के समय से चंपा के नरेशों ने अन्नम को नियमित रूप से कर देकर उनसे मित्रता बनाए रखी।

जय इंद्रवर्मन् षष्ठ के समय में कंबुजनरेश सूर्यवर्मन् द्वितीय ने 1045 ई। में चंपा पर आक्रमण कर विजय पर अधिकार कर लिया। दक्षिण में परम बोधिसत्व के वंशज रुद्रवर्मन् परमब्रह्मलोक ने अपने का चंपा का शासक घोषित किया। उसके पुत्र हरिवर्मन् षष्ठ ने कंबुजों और बर्बर किरातां को पराजित किया ओर आंतरिक कलहों तथा विद्रोहों को शांत किया। 1062 ई। में, उसकी मृत्यु के एक वर्ष के बाद, ग्रामपुर विजय के निवासी श्री जयइंद्रवर्मन् सप्तम ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया। उसने 1077 ई। में कंबुज पर आक्रमण कर उसकी राजधानी को नष्ट किया। जयइंद्रवर्मन् अष्टम के राज्य में श्री सूर्यदेव ने, जो चंपा का ही निवसी था लेकिन जिसने कंबुज में शरण ली, कंबुज की ओर से 1190 ई। में चंपा की विजय की। चंपा विभाजित हुई, दक्षिणी भाग श्री सूर्यवर्मदेव को और उत्तरी कंबुजनरेश के साले जयसूर्यवर्मदेव को प्राप्त हुआ। किंतु शीघ्र ही एक स्थानीय विद्रोह के फलस्वरूप उत्तरी भाग पर से कंबुज का अधिकार समाप्त हो गया। श्री सूर्यवर्मदेव ने उत्तरी भाग को भी विजित कर अपने को कंबुजनरेश से स्वतंत्र घोषित किया किंतु उसके पितृव्य ने ही कंबुजनरेश की ओर से उसे पराजित किया। इस अवसर पर जयहरिवर्मनृ सप्तम के पुत्र जयपरमेश्वर वर्मदेव ने चंपा के सिंहासन को प्राप्त कर लिया। कंबुजों ने संघर्ष की निरर्थकता का समझकर चंपा छोड़ दी और 1222 ई। में जयपरमेश्वरवर्मन् से संधि स्थापित की। श्री जयसिंहवर्मन्, के राज्यकाल में, जिसने सिंहासन प्राप्त करने के बाद अपना नाम इंद्रवर्मन् रखा, मंगोल विजेता कुब्ले खाँ ने 1282 ई। में चंपा पर आक्रमण किया किंतु तीन वर्ष तक वीरतापूर्वक मंगोलों का सामना करके चंपा के राज्य से उसे संधि से संतुष्ट होने के लिय बाध्य किया। जयसिंहवर्मन् षष्ठ ने अन्नम की एक राजकुमारी से विवाह करने के लिये अपने राज्य के दो उत्तरी प्रांत अन्नम के नरेश का दे दिए। 1312 ई। में अन्नम की सेना ने चंपा की राजधानी पर अधिकार कर लिया।

उत्तराधिकारी के अभाव में रुद्रवर्मन् परम ब्रह्मलोक द्वारा स्थापित राजवंश का अंत हुआ। अन्नम के नरेश ने 1318 ई। में अपने एक सेनापति अन्नन को चंपा का राज्यपाल नियुक्त किया। अन्नन ने अन्नम की शक्तिहीनता देखकर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। चे बोंग त्गा ने कई बार अन्नम पर आक्रमण किया और अन्नम का चंपा का भय रहने लगा। किंतु 1390 ई। में चे बोंगां की मृत्यु के बाद उसके सेनापति ने श्री जयसिंहवर्मदेव पंचम के नाम से वृषु राज़वंश की स्थापना की। 1402 ई। में अन्नम नरेश ने चंपा के उत्तरी प्रांत अमरावती को अपने राज्य में मिला लिया। चंपा के शासकों ने विजित प्रदेशों को फिर से अपने राज्य में मिलाने के कई प्रयत्न किए, किंतु उन्हें कोई स्थायी सफलता नहीं मिली। 1471 ई। में अन्नम लोगों ने चंपा राज्य के मध्य स्थित विजय नामक प्रांत को भी जीत लिया। 16वीं शताब्दी के मध्य में अन्नम लोगों ने फरंग नदी तक का चंपा राज्य का प्रदेश अपने अधिकार में कर लिया। चंपा एक छोटा राज्य मात्र रह गया और उसकी राजधानी बल चनर बनी। 18वीं शताब्दी में अन्नम लोगों ने फरंग को भी जीत लिया। 1822 ई। में अन्नम लागों के अत्याचार से पीड़ित होकर चंपा के अंतिम नरेश पो चोंग कंबुज में जाकर बसे। राजकुमारी पो बिअ राजधानी में ही राजकीय कोष की रक्षा के लिए रहीं। उनकी मृत्यु के साथ बृहत्तर भारत के एक अति गौरवपूर्ण इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय की समाप्ति होती है।

प्राचीन वियतनाम के समाज में व्याप्त भारत की झलक 

चंपा के इतिहास का विशेष महत्व भारतीय संस्कृति के प्रसार की गहराई में है। नागरिक शासन के प्रमुख दो मुख्य मंत्री होते थे। सेनापति और रक्षकों के प्रधान प्रमुख सैनिक अधिकारी थे। धार्मिक विभाग में प्रमुख पुरोहित, ब्राह्मण, ज्योतिषी, पंडित और उत्सवों के प्रबंधक प्रधान थे। राज्य में तीन प्रांत थे - अमरावती, विजय और पांडुरंग। प्रांत जिलों और ग्रामों में विभक्त थे। भूमिकर, जो उपज का षष्ठांश (छठा हिस्सा) होता था, राज्य की आय का मुख्य साधन था। राजा मंदिरों की व्यवस्था के लिये कभी कभी भूमिकर का दान दे देता था। न्यायव्यवस्था भारतीय सिद्धांतों पर आधारित थी। सेना में पैदल, अश्वारोही और हाथी होते थे। जलसेना की ओर भी विशेष ध्यान दिया जाता था।

उदारता और सहनशीलता चंपा के धार्मिक जीवन की विशेषताएँ थीं। चंपा के नरेश भी सभी विचारों का समान रूप से आदर करते थे। यज्ञों के अनुष्ठान को महत्व दिया जाता था। संसार को क्षणभंगुर और दु:खपूर्ण समझनेवाली भारतीय विचारधारा भी चंपा में दिखलाई पड़ती है। ब्राह्मण धर्म के त्रिदेवों में महादेव की उपासना सबसे अधिक प्रचलित थी। भद्रवर्मन् के द्वारा स्थापित भद्रेश्वर स्वामिन् इतिहास में प्रसिद्ध है। 11वीं शताब्दी के मध्य में देवता का नाम श्रीशानभद्रेश्वर हो गया। चंपा के नरेश प्राय: मंदिर के पुनर्निर्माण या उसे दान देने का उल्लेख करते हैं। शक्ति, गणेश, कुमार और नंदिनी की भी पूजा होती थी। वैष्णव धर्म का भी वहाँ ऊँचा स्थान था। विष्णु के कई नामों के उल्लेख मिलते हैं किंतु विष्णु के अवतार विशेष रूप से श्री राम और श्री कृष्ण अधिक जनप्रिय थे। चंपा के नरेश प्राय: विष्णु से अपनी तुलना करते थे अथवा अपने को विष्णु का अवतार बतलाते थे। लक्ष्मी और गरुड़ की भी पूजा होती थी। ब्रह्मा की पूजा का अधिक प्रचलन नहीं था। अभिलेखों से पौराणिक धर्म के दर्शन और कथाओं का गहन ज्ञान मिलता होता है। गौण देवताओं में इंद्रयमचंद्रसूर्यकुबेर और सरस्वती उल्लेखनीय हैं। साथ ही निराकार परब्रह्म की कल्पना भी उपस्थित थी। दोंग दुओंगबौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था। बौद्धधर्म के माननेवालों और बौद्ध भिक्षुओं की संख्या कम नहीं थी।

चंपा राज्य में संस्कृत ही दरबार और शिक्षितों की भाषा थी। चंपा के अभिलेखों में गद्य और पद्य दोनों ही भारत की आलंकारिक काव्यशैली से प्रभावित हैं। भारत के महाकाव्यदर्शन और धर्म के ग्रंथ, स्मृतिव्याकरण और काव्यग्रंथ पढ़े जाते थे। वहाँ के नरेश भी इनके अध्ययन में रुचि लेते थे। संस्कृत में नए ग्रंथों की रचना भी होती थी।

अब हम वियतनाम के बड़े इतिहास से परिचित हैं। इसे पढकर लगेगा ही नही कि यह देश भारत से करीब 3200 किलोमीटर दूर है। आज वियतनाम पूरी तरह बदल गया है। हिन्दू लोग अपनी संस्कृति को वैचारिक शक्ति और सैन्य शक्ति बनाने में असफल रहे। इसी कारण वहां राजवंश समाप्त हुआ। हिन्दू ताकत कम होने से दुसरे धर्म प्रभावी हुए। वियतनाम के उदाहरण से हम यह भी समझ सकते हैं की हिन्दू धर्म की राजनितिक विचारधारा और सत्ता में होना कितना जरूरी है। अगर हिन्दू राजवंश समाप्त न हुआ होता तो वहां हिन्दू धर्म आज भी होता। लेकिन सत्ता पर बोद्ध और मुस्लिम के आते ही हिन्दू धर्म समाप्त होता गया।


 

अभी कुछ दिवस पहले जो शिवलिंग मिला है वह Cham temple site की My sun sanctuary में स्थित है। यंहा पहले मन्दिर था लेकिन युद्ध की बमबारी में वो ध्वस्त हो गया। वियतनाम में बोद्ध लोगो ने हिन्दू धर्म के समाप्त हो जाने पर तमाम मन्दिरों को बोद्ध स्थान में बदल दिया था । इस वजह से कुछ मन्दिर अभी भी बचे हुए हैं क्योकि उनका रखरखाव बोद्ध भिक्षुक करते रहे हैं। कुछ मन्दिर क्षीर्ण हालत में हैं जबकि कईयों का अस्तित्व नही मिलता।



वियतनाम की हिन्दू संस्कृति का एक और रूप है जो खमेर संस्कृति, मेकोंग नदी, और भारतीय राजाओं द्वारा वंहा पर किये शासन से जिसका इतिहास जुड़ा है। उसको कम्बोडिया के इतिहास से जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए। उसकी चर्चा मैंने इस ब्लॉग में नही की है। उसके लिए अलग से कम्बोडिया पर लेख लिखूंगा।

जब जब दुनिया के अंदर बिना पूर्वाग्रह से खोज की जाएगी, जब जब धरती स्वयं अपने इतिहास को बताएगी। विएतनाम में शिवलिंग मिलने की पहली घटना नही है और न ही अंतिम। आज से करीब 4 साल पहले विष्णु की बड़ी प्रतिमा का सर का भाग मिला था। मूर्तियों के मिलने का सिलसिला अमेरिका, मेक्सिको, इंडो-चाइना क्षेत्र के सभी देशो, अरब, अफ्रीका, रूस, मंगोलिया, जर्मनी हर जगह जारी है। जर्मनी में मिली मूर्ति को तो वैज्ञानिकों ने 32 हजार वर्ष पुरानी बताया था।  



इसी के साथ झूठ साबित होती कई थ्योरी

किसी भी देश के लोगों के अंदर अपनी संस्कृति के प्रति, इतिहास के प्रति गर्व होता है। यह गर्व उनके स्वाभिमान से जुड़ा होता है। एक स्वाभिमानी राष्ट्र को अपने अधिकार में लेना आसान नही होता। जब मुस्लिम भारत में आये तो उनका यंहा राज स्थापित करना आसान नही था। भारत में इतिहास के ढेरों ऐसे प्रसंग थे जो हिन्दुओं में साहस भर देते थे। इसी कारण मुस्लिम राजाओं के खिलाफ सन 1200 से लेकर 1757 तक ऐसा कोई सा दशक नही रहा जब हिन्दू राजाओं ने अपनी आवाज न उठाई हो। मुस्लिमों ने इसीलिए भारतीय गर्व के प्रतीक इतिहास को कुचला। हमारी भावनाएं जिस मन्दिर से ज्यादा जुडी थी उनको ध्वस्त किया। इसलिए कश्मीर, पंजाब, हरियाणा का कुरुक्षेत्र, राजस्थान का पुष्कर, उत्तर प्रदेश में मथुरा, वृन्दावन, काशी, ,प्रयागराज, और अन्य सभी मुख्य मन्दिर ध्वस्त किये गये। इसके पीछे एक ही कारण था हिन्दुओं का गर्व समाप्त करना। बाद में अंग्रेजो ने इतिहास को दूसरी तरह से समाप्त किया। उन्होंने किताबें लिखीं जिसमे जानबुझकर इतिहास बदल दिया। तमाम युद्धों को, कहानियों को, हिन्दू ग्रंथों को अपने अनुसार लिखा। इससे बिना कुछ तोड़े और लम्बे समय तक भारत को अपने ही इतिहास से भ्रमित करने में वो सफल हो गये। आज़ादी के बाद वामपंथी इतिहासकार आ गये। इन्होने वही कार्य जारी रखा। सिन्धु घाटी सभ्यता को भारत से जोडकर सम्पूर्ण हिन्दू संस्कृति को मात्र 4000 वर्ष पहले तक समेत दिया। यानि बुद्ध के जन्म लेने से मात्र 2500 वर्ष पहले तक। महाभारत और रामायण को काल्पनिक करार दिया गया। आर्य बाहर से आये, इस थ्योरी को खूब प्रचलित किया गया। भारत को इन थ्योरी को मानने को मजबूर सरकारों ने किया और तमाम सिलेबस में यही पढ़ाया गया। हिन्दू संस्कृति का इतिहास को हिन्दुओं से ही दूर रखा गया। इसीलिए आज हमे वियतनाम में मिले शिवलिंग को देखकर आश्चर्य होता है क्योकि हम स्वयं उसे भूल चुके थे।

अब धीरे धीरे परिवर्तन आ रहा है। जब इंडोनेशिया, वियतनाम और कम्बोडिया जैसे देश अपने प्राचीन इतिहास को ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं तो हमे भी आगे बढकर अपनी संस्कृति को जानना चाहिए। कम्बोडिया भारत को हमेशा हिन्दू देश के रूप में देखता है क्योकि उस का भारत से वही रिश्ता है। वियतनाम के लोग आज भारत को उन्ही पुराने इतिहास के साथ अपने साथी के रूप में देखते हैं। हमे चाहिए कि हम भी अपनी पहचान हिन्दू को बनाएं और अपनी संस्कृति को बढ़ावा दें।    

रामायण के पुनः प्रसारण ने राष्ट्र को जगाया


समाज की नियतिराष्ट्र का भाग्यकाल चक्र और सत्ता के लिए अवसरजब इन चारों का मिलन होता है तो वह गाथा लिखी जाती है जिसकी कल्पना कभी नही की जा सकती। विश्व में कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ा तो एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ घटी जो कि कल्पना से परे थी। इस महामारी ने उन देशों को हिला कर रख दिया जिनके हर छोटे बड़े फैसले से विश्व प्रभावित होता है। अमेरिकायूरोप और एशिया की आर्थिकसैन्य महाशक्तियां जैसे चीनभारतजापानकोरिया आदि सभी कोरोना से प्रभावित हुए। किसी भी देश के लिए कोरोना वायरस आर्थिकसामाजिक और राजनैतिक नुकसान लेकर आया सिवाय भारत के। भारत इसमें अपवाद है क्योकि आर्थिक नुकसान तो हुआ लेकिन हमारा राजनैतिक और सामाजिक नुकसान नही हुआ। विश्व में आये बदलाव के बिलकुल अलग भारत ने सामाजिक और राजनैतिक मजबूती के लिए इस महामारी को इस्तेमाल किया। जैसा कि मैंने शुरू में कहा.. "समाज की नियतिराष्ट्र का भाग्यकाल चक्र और सत्ता के लिए उपयुक्त अवसरजब इन चारों का मिलन होता है तो वह गाथा लिखी जाती है जिसकी कल्पना कभी नही की जा सकती"। विश्व में कोई भी परिस्थिति बिना मानव के उठाये कदमों के कारण नही बनती लेकिन साथ में नियति भी हैजिसका मतलब कब क्या होना हैवह पहले से तय है। कोरोना वायरस के कारण यह आवश्यक था की देश को बंद कर दिया जाये। लॉकडाउन का एलान किसी भी समाज को निराशा में धकेल सकता है। किसी भी देश में विद्रोह को जन्म दे सकता। खासकर उस देश में जहाँ एक बड़ी जनसंख्या सिमित संसाधनों के साथ अनेकों समस्याओं के बीच रहती होवंहा के हालात क्या हो सकते हैंहम सिर्फ सोच कर ही घबरा जाते हैं। भारत में लॉकडाउन जब लागु हुआ तब तक हम सब इसकी जरूरत समझ चुके थे। जनता कर्फ्यू के साथ भारतीयों ने अपने स्वयं अनुशासन का परिचय दुनिया को दिया और उसके बाद तय नीति अनुसार भारत में लम्बा लॉकडाउन घोषित कर दिया गया। एक लम्बा समय घरों में कैद रहकर कैसा काटा जायेडर के माहौल में आशा की ज्योति और एक दृढसंकल्प की भावना समाज में कैसे आयेयह सब वो विषय थे जिसका उत्तर विश्व के सभी देश खोज रहे थे। भारत ने सबसे एक कदम आगे बढकर तय किया की राष्ट्रीय सरकारी चैनल पर विश्व के सबसे महाग्रंथ पर बने रामायण सीरियल का पुनः प्रसारण किया जायेगा। यह एक फैसला भारत के अंदर युग परिवर्तन सिद्ध होगाइसकी कल्पना किसी ने नही की थी। श्री राम का चरित्र आदर्श चरित्र है यह हम सब जानते हैं लेकिन क्यों हैशायद इससे हम नही जुड़े थे। खासकर युवा पीढ़ी और युवा पीढ़ी भारत की कुल जनसंख्या की 65 फीसदी हैवह श्री राम से राजनैतिक रूप से जुडी थीआस्था रूप से जुडी थी लेकिन जीवन ,मूल्योंपरम्पराओंआदर्शों का जो शिलालेख श्री राम ने बनायाउससे हम परिचित नही थे। किस्स्से कहानियों में सुन लेनाविशेषण इस्तेमाल कर लेनाजय श्री राम के नारे लगा देना सिर्फ इतना राम नही है। श्री राम नाम स्वयं में एक लम्बा और गौरवशाली इतिहास है। आदर्शों और जीवनमूल्यों की अमर कहानी है। दायित्वबोध और आपसी सम्बन्धों के बारे में बताती ज्ञान रूपी गंगा है।

 

जब रामायण भारत में पुनः प्रसारित हुई तो केंद्र में सत्ता में बैठे लोग वो थे जो वर्षों से श्री राम के मन्दिर के लिए संघर्षरत रहे हैं और करीब 500 वर्ष बाद श्री राम मन्दिर की पुनर्स्थापना करके ही रुके हैं। भारत की राजनैतिक सत्ता का रूप भी ऐसा है की राम विरोधी लोग ऊँगली उठाने तक की स्थिति में नही है। रामायण प्रसारण बड़ी बात नहीबल्कि बड़ी बात है परिवारों का उससे जुड़ना। लॉकडाउन में घरों पर रहना सबकी मजबूरी थी। ऐसे में रामायण से न सिर्फ वो पीढ़ी सीधे जुड़ी जिसने 80 के दशक में प्रथम प्रसारण पुरे भक्ति भाव से देखा था। इसके साथ वो पीढ़ी जो युवा हैसमझदार हैजिनके कंधों पर समाज और राष्ट्र का भार हैऔर भविष्य की पीढ़ी यानि बच्चे। हजारों वर्ष पूर्व भारत के सबसे बड़े शाही घराने रघुकुल के राजकुमार जिसके इछ्वान्कू वंश का शासन सम्पूर्ण पृथ्वी पर होचक्रवर्ती राजा-महाराजा जिस वंश में हुएदुनिया के सभी राज्य जिनकी अधीनता स्वीकार करते होउस शाही परिवार का एक युवा राजकुमार जिसे युवराज घोषित किया जाना है यानि कल का राजा तय होना हैवह पिता के वचन के सम्मान के लिए सब कुछ छोडकर वनवास के लिए वनों में चला जाता है। ऐसा पिता भक्ति का चरित्र दुनिया की किसी भी देश की किसी भी कहानी में नही मिलता। कौशल देश के ही पड़ोसी मिथिला देश की राजकुमारी जोकि बचपन से शाही परिवार में पली बढ़ीजिसके पिता स्वयं ब्रह्मा के वंशजो द्वारा स्थापित जनक परम्परा के जनक होजो राजकुमारी विश्व के सबसे बड़े राजघराने कौशल की बहु बन जाती होवो अपने पति के लिए सब कुछ त्यागकर वन का रास्ता चुन लेयह चरित्र विश्व के किसी भी कोने में नही मिलता। अपने भाई के लिए लक्ष्मण का वन जानायुवा पीढ़ी को झंकझोर देता है। विश्व के हर कोने में सत्ता के लिए संघर्ष की अनेकों कहानियां है। सत्ता के लिए न जाने कितने परिवारों में खून बहा है। पिता पुत्र के बीच की अंतर्कलाह की न जाने कितनी कहानियां इतिहास का हिस्सा हैं। रामायण में भरत का इतना बड़ा शासन राम की अनुपस्थिति के कारण नही अपनानाश्री राम के वनवास भोगने के दृढसंकल्प को देखकर उनकी चरण पादुका को सिंहासन पर स्थापित करकेस्वयं राजधानी से दूर वनवासी स्थिति में रहकर राज्य करनायह न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के सभी देशोंसभी सभ्यताओं को अद्भुत उदहारण पेश करता है। मित्र धर्म के लिए सुग्रीव-राम की मित्रता व् लंका विजयमित्र के लिए सब कुछ कर जाने की अद्भुत मिशाल है। राम वनवास से लेकर रावणवध तक रामायण की कहानी ने भारतीयों को जिस प्रकार अपने से जोड़ा वह अभूतपूर्व है। रामायण एक पुराना सीरियल है। जिस तकनीक और ग्राफ़िक्स का इस्तेमाल इसको बनाने में हुआ वह भी आज के जमाने के लिए गुजरी बात है। कहानी भी नई नही है। न जाने कितनी बार हम सुन चुके हैं फिर भी जिस प्रकार राम चरित्र को ध्यान से देखा गया उसकी कहानी बयाँ करती है बार्क की रेटिंग। रेटिंग अनुसार देश में रामायण शुरू होने से लेकर अंत तक भारत का सबसे ज्यादा देखे जाने वाला सीरियल रहा। रामायण के रात 09 बजे से 10 बजे तक प्रसारित होने के कारण और भारी दर्शक जुड़ने के कारण मीडिया चैनलों को भी अपने 9 बजे के प्राइम टाइम में बदलाव करना पड़ा। सुबह और शाम प्रसारित होते रामायण से समाज का जुडाव इसके प्रथम प्रसारण से भी ज्यादा रहा। नये तकनीक के युग में रामायण का प्रसारण सोशल मीडिया में छाया रहा। #Ramayan और #RamayanOnDDnational टॉप ट्रेंड रहने लगे। कोरोना वायरस के कारण #CoronaVirus जोकि टॉप ट्रेंड में थाउसको भी #Ramayan ने पीछे छोड़ दिया। गूगल सर्च में रामायण टॉप पर पहुँच गया साथ ही प्रसार भारती की वेबसाइट पर ट्रेफिक बढने से उसका क्रेश हो जानायह लोगों के बीच उसका क्रेज़ बताता है। सुबह-शाम प्रसारण के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा का माहौल बन जानाबदलते भारतीय समाज और अपने मूल से जुड़ते देश की तस्वीर बयाँ करता है। यह नये भारत के लिए अद्भुत पल था कि पहली बार मेघनाथ की पहले दो दिन बुराई के बाद तीसरे दिन के प्रसारण में जिसमें उसका लक्ष्मण के साथ आखिरी युद्ध व् वध दिखाया गयाउसमे उसकी प्रशंसा हुई। पहली बार मेघनाथ को करीब से युवा पीढ़ी ने जाना। इसके साथ ही #कुम्भकरण ट्रेंड किया जब कुम्भकर्ण की खुले मन से प्रशंसा भारतीय युवाओं ने की। श्री राम चरित्र को जाननाहर एक संवाद से भावनात्मक रूप से जुड़नाव अपने कर्तव्यबोध की शिक्षा रामायण ने दीउसने समाज को जागृत कर दिया। समाज में यह जागृति शायद ही कभी आ पाती। राजा कैसा होना चाहिएउसके क्या कर्तव्य हैंउसका आचरण क्या होव्यवहार क्या होजब इसपर रामायण में प्रसंग आये तो भारत की वर्तमान सत्ता और चमत्कारिक नेतृत्व का महत्त्व लोगों को समझ आने लगा। सन्यासी राजा जिसके लिए संसार में प्रजा व् राष्ट्र के आलावा कोई सगा सम्बन्धी न होउस चरित्र पर जोर दिया गया तो देशवासियों को अपने प्रधानमंत्री पर गर्व हुआ। 

रामायण में दो घटनाएँ ऐसी हैंजब श्री राम पर ऊँगली उठाने का मौका कुछ लोगों को मिलता है। पहला बाली वध और दूसरा सीता त्याग। इन दोनों ही मौका मिलने का कारण अज्ञान है। इस अज्ञान को भी रामायण के पुनः प्रसारण ने हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। रामायण में श्री राम के राजसिंहासन पर आरूढ़ होने के साथ ही रामायण सीरियल समाप्त होगया लेकिन आगे की घटनाओं को उत्तर रामायण नाम से शुरू कर दिया गया। यह रामायण का सबसे करुण भाग है। उत्तर काण्ड में भावनाएं दिल को छलनी कर देती हैराज धर्म और पति धर्म में फंसे राम की पीड़ा रुला देती है। सीता का रघुकुल रीत को बचाने और पति को राज धर्म से विमुख न होने देने के लिए स्त्री धर्म का सबसे बड़ा उदाहरण पेश करते हुए स्वयं वन चले जानाभारतीय समाज को अंदर तक हिला देता है। इस महान कहानी के अंत आते आते सीता माँ का वन गमन रिश्तों-नातोंसम्बन्धों और उनसे जुड़े कर्तव्यों की नई परिभाषा देता है साथ ही हजारों वर्ष पूर्व भारत में स्थापित उस महान शासन व्यवस्था को भी सामने लाता है जिसमें राजा सबकुछ जानते हुए भी राजधर्म का पालन करते हुए अपनी व्यक्तिगत हानि को भी सहन कर लेता है। प्रजा मत के आगे स्वयं का फैसला बदल लेता है। सही मायने में प्रजातंत्र की इससे अच्छी तस्वीर कंहा मिलेगीमाँ सीता का अपनी शाही पहचान के बिना वाल्मीकि आश्रम में रहना और बिना अपने अतीत का फायदा उठाये अपने बच्चों को स्वावलम्बी बनानास्त्री सशक्तिकरण की मजबूत तस्वीर तैयार करता है। बिना किसी शाही पहचान के अपने अथक परिश्रम और वनवासी भेषखानपान के साथ कुश और लव का इतना मजबूत होजाना की मेघनाथ विजेता लक्ष्मणलवड़ासुर जैसे बलशाली को हराने वाले शत्रुघन और महा पराक्रमी भरत को युद्ध में धाराशायी कर देनायह प्रसंग न जाने कितनी ही अपने पति के बिना रहने वाली स्त्रियों को अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए प्रेरित करता होगा। लव-कुश अपनी माता के प्रति प्रजा में व्याप्त भावना को हटाने और उनके दिल पर आघात करने के लिए निकला करुण गीत हम सबके आँखों में आंसू ला देता है। तमाम पश्चिमी गानोंवर्तमान के हिप-हॉप सोंग को चाप से सुनने वाली युवा पीढ़ीडीजे पर थिरकने वाले युवा और रैप को श्रेष्ठ गीत बताने वाले बच्चे जब "हम कथा सुनाते श्री राम कीगीत को बार बार सुनने को तैयार हो जाएँतो समाज जागृति वैसे ही सम्भव हो जाती है।

स्त्री चरित्र को हमेशा से कटघरे में रखने की समाज परम्परा पर गहरा आघात करती रामायण की उत्तर काण्ड की कहानी स्त्री की जिम्मेदारीकर्तव्यसहनशीलतात्याग और शक्ति को प्रस्तुत करती है। समाज के सामने अंत में भी जब सीता को परीक्षा देने के लिए महाराज राम द्वारा कहा जाता है तो अंदर रोते बिलखते पति और दो बच्चों के पिता को स्पष्ट देखा जा सकता है। राजधर्म में मजबूर राजा जब पवित्रता की शपथ के लिए माँ सीता से कहता है तो माँ सीता ऐसी शपथ लेती हैं जोकि युगों युगों तक शिलालेख की भांति अमर हो जाती है।

बार बार स्त्री पर उठते सवाल का उत्तर माँ सीता कुछ ऐसे देती हैं जो हम सबके सीने को भावना और संवेदना के तीर से छलनी कर देता है और पीछे छोड़ देता है अपनी गलती पर पछताते समाज को और एक राजा के कर्तव्य को कभी न त्याग पाने वाले राम को रोते बिलखते।

रामायण एक अमर कहानी है। वाल्मीकि जी ने वास्तव में जो देवतुल्य कार्य इसके लिखित रूप देने से किया वह आज युगों के बीतने पर भी वैसे ही पवित्र है। इसके साथ ही तकनीक के साथ पर्दे पर उतारने का कार्य जो रामानंद सागर ने किया वो सर्वश्रेष्ठ है। साथ ही महान हैं वो किरदार जिन्होंने रामायण सीरियल को भी मानव के तकनीकी इतिहास का सबसे अमिट सीरियल बना दिया। रामायण सीरियल का बनना शायद ही कोई देव कृपा रही होगी। आज 02 मई को रामायण के उत्तर कांड का अंतिम प्रसारण होना बाकि है। अभी रामायण सीरियल ने एक और रिकॉर्ड अपने नाम किया है। वह है विश्व का सबसे ज्यादा देखे जाने वाले सीरियल का रिकॉर्ड। बीते 16 अप्रैल को रामायण को 7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने एक साथ देखा जोकि अभी तक कभी नही हुआ था। रामायण सीरियल का प्रसारण आज भले ही समाप्त हो रहा होलेकिन कोटि कोटि भारतीयों के दिल में रामायण द्वारा जो ज्योति जली है वह हमेशा रहेगी।     

 

विश्व में बड़े बदलाव का समय - कोरोना वैश्विक महामारी


अनुभव हमें मजबूत बनाता है। मानव सभ्यता अगर आज उन्नत है तो इसके पीछे हजारों वर्ष का अनुभव ही आधार है। अपनी गलतियों से सीखना, कुछ नया करके देखना, कुछ नया जानने की कोशिश करना या किसी आपातकालीन स्थिति में हमारे द्वारा लिया गया निर्णय यह सब हमको प्रतिदिन विकास के पथ पर अग्रसर करते हैं। मानव सभ्यता ने इतिहास में अनेकों समस्याओं, चुनौतियों को झेला। इन्ही समस्याओं के अनुसार अपने को ढाला। जो लोग अपने को परिवर्तित करने में सक्षम हो पाए वो आगे बढ़ गये और जो नही हो पाए वो वंही समाप्त हो गये। समस्याओं के कारण ही एकजुटता हमारे स्वभाव का हिस्सा बनी। परिवार और गाँव की व्यवस्था इसी मानव स्वभाव के कारण है।  परिवार से गाँव, गाँव से कस्बे या शहर, शहरों से राज्य और राज्यों से मिलकर देश बना। (सांस्कृतिक एकता राष्ट्र का आधार है) अगर बात करें अपने देश भारत की तो हमारा इतिहास दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा पुराना है और आज भी सुरक्षित है। दुसरे देशों का या तो जीवन इतना उन्नत नही था या फिर उनका इतिहास ही समाप्त हो गया। यहाँ भी वही बात आती है कि उन देशों के सामने समस्याएँ आई होंगी और वो उसका सामना नही कर पाए इसलिए इतिहास क्या था, कैसा था उसका ज्ञान आज की वहां की वर्तमान पीढ़ी को नही है।

मानव को प्यास लगी तो तालाबों - नदियों के पास रहने रहने का प्रबंध किया। हर नदी किनारे का स्थान रहने उपयुक्त नही रहा होगा तो कुओं को बनाना शुरू किया। लकड़ी आदि से बनी खुले आसमान के नीचे रहने में समस्या आई होगी तो गुफाओं कन्दराओं का आश्रय लिया। वहां भी परेशानी आई तो झोपड़ी या कुटिया बनाना शुरू किया। मौसम की मार पड़ी तो पक्का घर बनाने के लिए मानव तैयार हुआ होगा। भूख के लिए जंगली फल-सब्जियों पर आश्रित मानव धीरे धीरे कृषि करना शुरू किया होगा। हिंसक जानवरों से सुरक्षा के लिए हथियारों का इस्तेमाल शुरू किया और बाद में कबीलों आदि का आस्तित्व बचाने के लिए हथियार बनाये। धीरे धीरे अपना आचरण, व्यवहार सभी के अनुरूप बनाने के लिए परम्पराओं को जन्म दिया, रहने, खाने के नियम बनाये। अनुभव के आधार पर प्रकृति के उपर अपने को आश्रित देखकर उसको माँ का दर्जा दिया। जैसे जैसे समझ बढ़ी तो सूर्य की आवश्यकता को समझा, उसे ईश्वर माना। प्रकृति को समझा तो उसमे भी देवत्व देखने लगा। 


ब्रहमांड को समझने की कोशिश की और उसे अपने से जोड़कर देखा। ऋषि-मुनियों ने अध्यात्म का सहारा लेकर स्वयं को जाना और फिर प्रकृति अनुकूल नियम बनाये जिससे मानव को कम से कम हानि हो। वेदों में सूर्य, चन्द्र और वायु देव की स्तुति मानव के आत्म साक्षात्कार की कहानी बताती है और उसके प्रकृति की समझ दर्शाती है। धीरे धीरे हमने और अधिक जानने की इच्छा अनुसार खोज की, समुन्द्र रास्ते में आया तो उसके उपर चलने के लिए नाव तैयार की। जो भी मानव ने खोजा, जाना उसका एक कारण उसके सामने आई तत्कालिक समस्याएँ ही रही। बिना समस्याओं के आने से मानव अपने में सुधार न कर पाता और न ही आज की तरह आधुनिक बन पाता।

वर्तमान में मानव लाखों वर्षों के अनुभव के आधार पर काफी कुछ प्राप्त कर चुका है। हजारों वर्षों पहले मानव ने एक स्थान से दुसरे स्थान की तरफ प्रस्थान करना आरम्भ किया और आज की स्थिति अनुसार प्रथ्वी के हर उस द्वीप पर जहाँ मानव रह सकता है, आज वहां मौजूद है। अपने अपने हित अनुसार, स्वार्थ अनुसार, सुविधाएँ, परिस्थिति और विचारों के अनुसार स्वयं को देशों में बांटा। इन पिछले हजारों वर्षों में मानव के विचार भी परिपक्व हुए और उसका सुख पाने का सपना और बढ़ा होता गया। जब प्रकृति पर पूरी तरह आश्रित था तो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भी दर्शाता था लेकिन समय के साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझना भी प्रारम्भ किया। देशों की सीमा के साथ ही मानव के विचार बदलते गये और हर क्षेत्र के मानव की गतिविधि, सोच, कार्य, परम्परा, मत, विचार में परिवर्तन आया। प्रकृति मानव का मूल है यही अंतिम सत्य है लेकिन इसी सत्य पर अपने नये अनुभवों की परतें चढाते चढाते वह इसी मूल सत्य से दूर होता चला गया। भारत में अति प्राचीन ज्ञान को समय के साथ बदलने की व्यवस्था विद्यमान हुई। प्रकृति के मूल सिद्धांत या कहें इस सृष्टि के मूल सत्य को कहने का तरीका समय के साथ हमने बदल दिया लेकिन मूल में वही रहा जो आज से हजारों वर्ष पहले था। इसी लिए सूर्य, चन्द्र, वायु में ईश्वर देखने वाला हिन्दू युगों के बीतने के साथ मर्यादा और व्यवहार के आदर्श श्री राम को ईश्वर कहने लगा, शक्ति और ज्ञान के आदर्श श्री कृष्ण को ईश्वर के रूप में देखने लगा, महावीर और महात्मा बुद्ध के ज्ञान और जीवन पद्धति से प्रभावित होकर उनको ईश्वर का दूत समझने लगा लेकिन सूर्य, चन्द्र, वायु की आवश्यकता को समय के साथ नही नकारा। 


आज से कई हजार वर्ष पूर्व जब श्री कृष्ण और श्री राम का जन्म भी नही हुआ था, तब भी सूर्य, वायु, अग्नि हमारे अभिन्न अंग थे और आज भी हैं। इसीलिए भारत का यह विचार जोकि पुराने से पुराना है और नये से नया, यानी इसमें पुराने विचारों और समय के साथ आये नये विचारों, दोनों को स्थान मिला हो और समय के साथ बदलाव को स्वीकार करता हो, ऐसे विचारों के साथ जीवन यापन करने की पद्धति सनातन धर्म कहलाई। भारत में समय के साथ बदलाव हुए, विचारों में सुख की कामना शुरू हुई लेकिन सुख को भी प्रकृति की सेवा के लिए इस्तेमाल करने का विचार अपनाया। हमसे प्रकृति नही बल्कि प्रकृति से हम हैं, इसको अंतिम सत्य मानकर प्रगति करने वाला भारतीय समाज सुख सुविधाओं के मिलने का बाद भी प्रकृति से दूर नही हुआ। जबकि दूर देशों में मानव ने सुख को ही अंतिम सत्य मान लिया और प्रकृति से स्वयं को कब दूर कर लिया, उसे ही पता न चला। भारत लगातार स्वयं पर बन्धनों पर बंधन लगाते गया जिससे हमारे विकास को गति भी मिली और दिशा भी। जबकि भारत की सीमाओं से दूर प्रगति तो हुई लेकिन एक तय दिशा न होने के कारण उनकी जीवन जीने की पद्धति कब प्रकृति से विपरीत हो गयी, उनको भी नही पता चला। कब उनके विचारों और प्रकृति के मूल नियमों में टकराव उत्पन्न हो गया यह किसी को ज्ञात नही। सम्भवतः गैर भारतीय समाज प्रगति की अंधी दौड़ में शामिल तो हो गया लेकिन अपने पथ को तय नही कर पाया।

भारत के सामने भी काफी प्रश्न थे जिनका उत्तर हम चाहते थे लेकिन हमारे ऋषि मुनियों ने पहले स्वयं के शरीर को अच्छी तरह समझा। उपनिषद कहते हैं कि जो दुनिया हमारे शरीर से बाहर हमे दिखती है, उतनी ही बड़ी दुनिया हमारे शरीर के अंदर मौजूद है। उपनिषद का यह कथन कोई ईश्वरीय कथन नही है कि बादलों के बीच से भविष्यवाणी हुई, बल्कि हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों के अनुभव के आधार पर है। इसी अनुभव के आधार पर चिकित्सा क्षेत्र में भारत अग्रणी हो गया। 


शरीर की कमियों और खामियों को दूर करने के लिए शोध करते करते हमने आयुर्वेद बना लिया और स्वास्थ्य सुविधायों में अग्रणी हो गया। शरीर को प्रकृति से जोड़कर देखा और पाया कि प्रकृति का प्रभाव शरीर पर कैसे पड़ता है और इसलिए कुंडलिनी आदि शारीरिक शक्तियों का हमको बोध हुआ और योग, ध्यान, प्राणायम, समाधि आदि का वो रास्ता हमने खोज लिया जो न सिर्फ सुख प्राप्त करने का साधन बना बल्कि मानव को ईश्वर से जोड़ने का पथ भी बना।


 हमने आसपास पेड़ पौधों का प्रभाव जाना, महत्त्व जाना और उनके जीवन की रक्षा के लिए विश्व में सर्वप्रथम न सिर्फ उनके सजीव होने का सत्य जाना बल्कि संरक्षित करने के लिए देवत्व को उसमे देखा।

 हमने प्रथ्वी से दिखने वाली विशाल सृष्टि को अपने शरीर से जोड़ा और आकाश में घटित घटनाओं का शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को काफी समय तक अनुभव किया और इसी आधार पर ज्योतिष हमारे सामने आई। मस्तिष्क में मौजूद एक बहुत छोटे अंग जोकि पूरी तरह निर्वात होता है ठीक वैसे ही जैसे प्रथ्वी के वातावरण से बाहर निकलने पर ब्रह्माण्ड है, को समझते समझते हमने ब्रह्माण्ड को समझा और ज्ञान-विज्ञानं में भी अग्रणी हो गये।


इन सब शोधों, खोजों और अविष्कारों का मूल हमारी जानने की इच्छा और सुख की कामना रही हो लेकिन बिना समस्याओं के यह कुछ भी सम्भव नही था, यही अंतिम सत्य है। मानव तभी आगे बढ़ पाया जब वह समस्याओं से जूझा।

ऐसा कोई राष्ट्र नही जिसने समस्याओं का सामना नही किया, ऐसी कोई सभ्यता नही जो समस्याओं से नही लड़ी, ऐसा कोई समय नही, जब समस्याओं ने मानव को न घेरा हो। हर काल में, हर युग में, हर सदी में समस्याएँ आई हैं, कुछ में कुछ लोग सम्भले तो कुछ गिरे। जो गिरे वो आज नही हैं, जो आज हैं वो उन समस्याओं से जीत कर आये हैं।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो का नाम आज हम सुनते हैं जो कभी मानव सभ्यता थी लेकिन आज उनका आस्तित्व नही है क्योकि उनके सामने जो भी समस्या आई उसका वो सामना नही कर पाए। मिस्त्र और यूनान के लोग भी समस्याओं का सामना नही कर पाए। इस जैसे अनेकों उदाहरण हमारे समक्ष हैं।


आज मानव सभ्यता के इतिहास के सबसे उन्नत समय में, सबसे आधुनिक समय में मानव सभ्यता फिर एक बार एक समस्या का सामना कर रही है। यह समस्या फिलहाल पिछले सौ वर्षों में आई सबसे बड़ी समस्या है। यह समस्या मानव सभ्यता को पूरी तरह नष्ट कर दे, ऐसा नही है लेकिन देशों के लिए इतनी घातक सिद्ध हो सकती है कि उनके विकास करने की गति न सिर्फ प्रभावित होगी, अवरुद्ध होगी बल्कि समय में पीछे भी धकेल सकती है। हमे इससे लड़ना होगा, जीतना भी होगा। वर्तमान में जारी इस महामारी से विश्व को नया अनुभव मिला है। इस महामारी से लड़ने और उभरने के बाद विश्व में अवश्य परिवर्तन आएगा। परिवर्तन दिखने भी लगा है। विश्व के लिए अपनी परम्पराओं और संस्कृति को कोसने का समय है। भारत के लिए यह समय अपने परम्पराओं और संस्कृति पर गर्व करने का समय है।