सावरकर और हिन्दू राष्ट्र


शादी के कार्ड के लिए बनाये टेम्प्लेट को आप जन्मदिवस के निमंत्रण देने के लिए इस्तेमाल नही कर सकते। वो व्यवहारिक नही होगा। दोनों का अलग महत्त्व है। हालाँकि दोनों ही निमंत्रण पत्र हैं लेकिन दोनों में बहुत अंतर है।

अगर आपको यह समझना है कि एक फल का स्वाद कैसा है तो आप किसी दूसरे फल को चखकर समझ सकते हैं क्या? क्या जामुन खाने में कैसी लगती है, वो आम खा कर समझा जा सकता है क्या?

भारत एक लम्बे काल खण्ड तक विदेशी लोगों के द्वारा शासित किया गया। भले ही मुगल काल में विदेशी शासन में स्थायित्व नही आया हो, मतलब बीच बीच में भारतीय राजाओं ने मुगलों के तख़्त को पलटा लेकिन 200 वर्ष का अंग्रेजी काल स्थायित्व के साथ था। इन्ही 200 वर्षों में भारत के खानपान, सोच और विचार में विदेशी घुस गए। भारत का वर्तमान तो विदेशियों के कब्जे में था ही, इतिहास और भविष्य भी कब्जे में लेने की कोशिश हुई।

यह कोशिश इस प्रकार हुई कि भारत के लिए जो भी गर्व के प्रसंग इतिहास में थे वो सब या तो दबा दिए गए या इस प्रकार बदल दिए गए कि सन्देह प्रकट करने का अवसर मिलता रहे। अंग्रेजी इतिहासकारों व् अंग्रेजी उँगलियों के कठपुतली वामपंथियों द्वारा लिखा इतिहास या तो अंग्रेजों को महिमाण्डित करता है या मुगलों को। अकबर महान इसी विदेशी इतिहासकारों की उपज है। सिकन्दर महान इन्ही वामपंथियों की उपज है। आर्यों का भारत का मूल निवासी न बताना इन्ही का षड्यंत्र है।

इतिहास पर जब अपनी पकड़ विदेशीयों व् विदेशी सोच के लोगों ने बना ली तो उन्होंने कई नीति और बातें ऐसी गढ़ी ताकि भविष्य में भी उन्ही के विचार भारत में व्याप्त रहें। अंग्रेजों की नीति इतनी मजबूत थी कि 70 साल बाद भी अगर कोई भारत में यह कहे कि अंग्रेजी छोड़कर अपनी भारतीय भाषा को पढ़ाया जाना चाहिए तो यंही पर ही इसका तेज विरोध शुरू हो जाता है। नए नए तर्क देकर विदेशी विचारों की गुलामी करने को शान समझा जाता है। आधुनिकरण और तकनीक का हवाला देकर अंग्रेजी को अनिवार्य बनाने की वकालत की जाती है। लेकिन ये सभी तर्क तब जमीदोज हो जाते हैं जब हम देखते हैं कि चीन दुनिया की दूसरी बड़ी महाशक्ति बनने जा रहा है अपने भाषा के दम पर। जापान कई वर्षों तक दुनिया में अपने धाक जमाता रहा अपने भाषा के दम पर। दक्षिण कोरिया तकनीक और आधुनिकता में काफी आगे निकल गया अपनी भाषा के दम पर। जर्मनी ने तकनीक में लोहा मनवा लिया अपनी भाषा के दम पर। यँहा तक कि अब तो अरब देशों के सामान पर भी वंहा की भाषा होती है। लेकिन दुनिया की सबसे प्राचीन, सुव्यवस्थित और सबसे अच्छी व्याकरण वाली संस्कृत भाषा के देश भारत, में अभी भी अंग्रेजी हटाने की कोशिश नही की गयी। आज सॉफ्टवेयर बनाने के लिए अंग्रेजी भाषा के स्थान पर संस्कृत में एल्गोरिथ्म लिखें तो उसमे अंग्रेजी के मुकाबले गलती होने के चांस कम है।

भारत को कभी भारत की नजरों से नही देखा गया। सिकन्दर पोरस की लड़ाई को युनान देश के इतिहासकारों की किताबों से समझा गया और इसीलिए पोरस को हमने भुला दिया, क्योकि युनान वालों ने कभी भी पोरस को इतना महिमामण्डित नही किया और सिकन्दर के थक जाने के कारण वापस लौटने की बात कही।

अंग्रेजों, डचों, पुर्तगाली, फ्रेंच इन सभी ने भारत में राज करने के लिए काफी कोशिश की। इन सभी को मराठाओं ने खदेड़ा और काफी दुर्गति की, यह ब्रिटिश काल में लिखे इतिहास में मिटा दिया गया. हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता से काफी पहले से और उनके समकालीन भी सरस्वती और गंगा नदी तट पर भारतीय सभ्यता फल फूल रही थी, यह इतिहास में नही लिखा गया। आज के इराक, ईरान की जगह 3 हजार साल पहले मौजूद बेबीलोन की सभ्यता और उससे भी काफी पहले मौजूद तुरुक, असीरिया, आदि सभ्यताओं के उद्गम काल में वंहा भारत की तरह मूर्ति पूजा का प्रचलन था, यह बात इतिहास में नही बताई गयी। इस्लाम धर्म के अस्तित्व में आने से पहले मिस्र और युनान से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध थे, इस बात को दबाने की काफी कोशिश हुई। मुगल काल में भारत में हजारों मन्दिरों को तोडा और लूटा गया, अयोध्या समेत पुष्कर, कुरुक्षेत्र, मथुरा, वृंदावन, काशी, जैसी पवित्रतम स्थानों पर या तो मन्दिर तोड़ दिए गए या वंहा मस्जिद बना दी गयी, यह भी इतिहास में नही लिखा गया। अयोध्या में तो एक लम्बी अदालत कारवाई के बाद यह साबित कर दिया गया कि राम मन्दिर वंहा मौजूद था लेकिन मथुरा, काशी में अभी भी या मामला लम्बित है।

इन सबके इतर भारत के भविष्य पर कब्जे को इस बात से भी समझा जा सकता है कि भारत को सेक्युलर देश बनाने की कोशिश हुई। "हिन्दू मुस्लिम एकता" के धरातल पर भारत का आज़ादी के बाद पूरा स्वरूप गढ़ा गया। यह एकता हर उस जगह खत्म हो जाती है जँहा हिन्दू लोग संख्या में मुस्लिमों से कम हो जाते हैं। कश्मीर, बंगाल, केरल इसके उदाहरण है। लेकिन भारत को लम्बे समय तक कमजोर बनाये रखने के किए जानबूझकर सेक्युलरिता को संविधान में घुसाया गया।
सेक्युलरिता का इस्तेमाल इसलिए भी सोच समझ कर किया गया ताकि भविष्य में कोई हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात न करे। हिन्दू राष्ट्र की स्थापना वो सबसे मुख्य विषय है जिसको दबाने के लिए दुनिया की सभी ताकतें चाहे वो ईसाई देश हो, मुस्लिम देशों के संगठन हो, वामपंथी देशों के संगठन हो या भारत में खुद अंग्रेजी विचारों को अपना चुके लोग, सभी मिलकर इसका विरोध कर रहे हैं। सोचिए भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का विरोध वो पाकिस्तान भी कर रहा है जो स्वयं एक आधिकारिक मुस्लिम राष्ट्र है। हिन्दू राष्ट्र को लेकर नीतिगत तरीके से इसको दबाने पर काम हुआ है इसलिए आज युवाओं को यह पता ही नही है कि हिन्दू राष्ट्र है क्या? यह क्यों जरूरी है?

दरअसल हिंदुत्व, ईसाई और मुस्लिम ये तीनों धर्म राजनितिक शाखा के साथ रहे हैं। यानि सत्ता पर काबिज रहे हैं। जो धर्म सत्ता पर काबिज होता है वो मजबूत होता है। जैन धर्म भले ही हिंदुत्व की शाखा हो लेकिन जिस विचारों को वो मानता या कहता है उस विचारों को मानने वाले कभी सत्ता पर नही बैठे। बौद्ध धर्म को मानने वाले राजा भारत में हुए। स्वयं अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाकर और इसे स्टेट रिलिजन बनाकर इसे मजबूत किया। इसके कारण पुरे भारत में बौद्ध धर्म का वर्चस्व बढ़ा और हिंदुत्व बहुत कम रह गया। बाद में शंकराचार्य जी ने समाज में सामाजिक और राजनितिक चेतना जागृति की जिससे हिंदुत्व फिर भारत में बढ़ गया।

अरब देशों सहित भारत और यूरोप तक मुस्लिम शासन रहा। यूरोप में ईसाई शासन रहा। मुस्लिम - ईसाई देशों में धर्म के नाम पर लड़ाई भी हुई। यहूदी धर्म भी राजनितिक है। यहूदी राज्य फिलिस्तीन जोकि बाद में उजड़ गया था। इसे काफी लम्बे संघर्ष के बाद दोबारा इजराइल के नाम पर बसाया गया है। अब यहूदी धर्म इजरायल का स्टेट रिलिजन बना हुआ है। हिंदुत्व का इतिहास इन सभी धर्मों से पुराना है। यह हमेशा से स्टेट रिलिजन रहा। मुगल काल में विजयनगर साम्राज्य, उसके बाद मराठा साम्राज्य हिंदुत्व विचारों के साथ थे। 




मराठा साम्राज्य तो योजनागत तरीके से हिंदुत्व शासन पुरे भारत पर स्थापित करने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित किया गया। मराठा बाद में इसमें सफल हुए और दिल्ली में भगवा ध्वज फहराया। बाद में भारत में मुगल शासन और उसको ब्रिटिश शासन आया। हिंदुत्व स्टेट रिलिजन बने ही न इसलिए इसके राजनितिक स्वरूप को समाप्त करने की कोशिश हुई। ध्यान रहे कि कर्म कांड धर्म का अलग रूप है और उसकी राजनितिक शाखा अलग है। हिंदुत्व को पोलिटिकली समाप्त करने में विदेशी कामयाब भी हुए। बाद में वीर सावरकर ने मृत बन चुके हिन्दू धर्म की राजनितिक शाखा को दोबारा धरातल पर उतारने का कार्य प्रारम्भ किया। उन्होंने हिन्दू, हिंदुत्व और हिन्दू शासन या कहें हिन्दू राष्ट्र पर काफी कुछ लिखा है। दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से सावरकर को आज़ादी से पहले तो ब्रिटिश लोगों ने प्रताड़ित किया ही, लेकिन आज़ादी के बाद भी उनको काफी प्रताड़ना झेलनी पड़ी। देश के लिए कालापानी सजा भोगने वाले सावरकर को आज़ाद भारत में भी बदनाम किया गया ताकि हिंदुत्व की राजनीतिक शाखा मजबूत न होने पाये। उनकी तमाम किताबों को बैन किया गया या जनता की पहुँच से दूर रखा गया। सावरकर ने हिन्दू राष्ट्र की जरूरत और उसके स्वरूप को बताया है। आज़ादी के बाद बनी सरकार भारतीय विचारों से नही चलती थीं। पहले प्रधानमंत्री नेहरू वामपंथ से पीड़ित थे। उसके बाद भी करीब 7 दशक बीत जाने के बाद न कोई हिंदुत्व विचारों की सरकार बनी न हिंदुत्व विचारों वाला शासन स्थापित करने के लिए सत्ता ने कभी कोशिश की। हालाँकि इन सब प्रतिकूल वातावरण में सावरकर की बातों को खूब दबाया गया हो लेकिन उन्ही विचारों को साथ लेकर डॉ. हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि RSS की स्थापना कर दी। सावरकर ने कहा था कि अगर भारत का वैभव दुनिया में फैलाना है तो इसे हिन्दू राष्ट्र बनना ही होगा। और यह सिर्फ हिन्दू धर्म मानने वाले लोगों के सत्ता पर पहुँचने से नही होगा बल्कि हिंदुत्व के विचारों को पूर्ण समर्पित लोगों के पहुंचने से होगा। सावरकर जी का कहना था कि हिंदुत्व विचारों के शासन का दुनिया को फायदा होगा। विश्व की समस्याओं का समाधान करने के लिए भारत हमेशा आगे रहा है। भारत फिर से दुनिया का नेतृत्व करने में सक्षम हो सकेगा अगर हिन्दू शासन स्थापित हो जाये। इसको स्थापित करने के लिए जरूरी है भारत के लोग यह समझें कि वो हिन्दू हैं और हिन्दू होना सबके लिए गर्व की बात है। हिन्दू होना हमे दुनिया में श्रेष्ठ बनाता है। हमे अपने गौरव और स्वाभिमान को समझना होगा। हमे अपने असली इतिहास को जानना होगा। आज़ादी से पहले और उसके बाद हमे पिलाई जा रही अहिंसा की घुट्टी को त्यागकर यह समझना होगा कि हिन्दू अपने देश को बचाने के लिए पिछले 800 वर्षों से लड़ रहा है और मर रहा है। मुगल काल में अनगिनत लोगों ने बलिदान दिया अपने मन्दिरों को बचाने के लिए। अपनी बेटियों-स्त्रियों को बचाने के लिए। ब्रिटिश काल में भी  हम कभी शांत नही बैठे। हमे आज़ादी चरखा चलाकर नही मिली। बल्कि हमने मंगल पाण्डे की तरह बन्दूक चलायी, रानी लक्ष्मी बाई, अवन्ति बाई लोधी की तरह हमारी स्त्रियां तलवार लेकर मैदान में आई। खुदीराम बोस की तरह हजारों 17-18 वर्ष के अल्पायु में बच्चों ने बलिदान दिया। सावरकर की तरह ब्रिटेन में रहकर ब्रिटेन साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का कार्य किया और कालापानी जैसे सजा भोगी। सुभाष चन्द्र बोस की तरह सेनाएं तैयार की और अपने देश के लिए लड़े। जब भारत के लोग हुण-कुषाण से लेकर, यूनानी(सिकन्दर), मंगोल, तुर्की, अरबी, के सामने चुप नही बैठे तो क्या अंग्रेजों के सामने बैठे होंगे। यह हमे समझना होगा। जब भारत के लोग अपने को गर्व से कहेंगे कि हम हिन्दू हैं, तब वास्तव में भारत में हिन्दू विचारों की सत्ता स्थापित होगी और भारत हिन्दू राष्ट्र बन जायेगा। 



यह सब कार्य करने से रोकने के किए शत्रु आगे आएंगे, यह बात सावरकर को पता थी। आज़ादी के बाद भी हिन्दू राष्ट्र को रोकने के लिए लोग हमारे आगे आएंगे। इससे वो भलीभंति परिचित थे। सावरकर अपने विजन को लेकर इस बात और अधिक चिंतित थे की कुल आबादी के उन्होंने सिर्फ 10% होने के बाबजूद अपने लिए अलग देश बनवा लिया.. भारत के हिस्से करने में सफल रहे और हिन्दू अपना स्वाभिमान भूलकर चुपचाप बैठा रहा। यही हिन्दू आने वाले वर्षों में हिन्दू राष्ट्र का सपना पूरा कर पायेगा? इसी चिंता को दूर करने के लिए सावरकर ने हिंदुओं के एकत्रीकरण यानि एकता और उनका सैन्यकरण यानि हिन्दू हित के लिए लड़ने वाली सेना जो समाज रक्षा के किए हमेशा तैयार रहे, इसे बनाने के विचार को बनाया।


वर्ष 1925 में डॉ. हेडगेवार जी ने हिन्दू एकता स्थापित करने के लिए कार्य शुरू किया। संघ ने हिंदुओं को अपने स्वर्णिम इतिहास से परिचय कराना शुरू किया। हिन्दू होना गर्व की बात है, यह लोगों को बताना शुरू किया। समाज में चेतना का प्रसार किया। सभी हिंदुओं को संघ में आने को आमंत्रित किया। मुस्लिम हर शुक्रवार को नियमित रूप से इकट्ठा होते हैं। ईसाई रविवार को इकट्ठा होते हैं। लेकिन हिंदुओं में यह नही था। कोई खास अवसर पर ही हिन्दू एकत्रित होते हैं
आरएसएस ने अपना स्वरूप इस तरह बनाया की हर सुबह और शाम शाखा पर लोग एकत्रित हों। इससे आपसी भाईचारा बढ़ेगा, एक दूसरे के सुख दुःख में साथ खड़े होने की भावना विकसित होगी। हमारे समाज को कैसे मजबूत करना है इसपर चर्चा हो सकेगी। योग के जरिये रोगमुक्त समाज बनेगा। व्यायाम से हमारे लोग मजबूत होंगे।

संघ ने अनुशासन को किसी फ़ौज की तरह बनाया। एक ड्रेस बनाई। घोष बनाया यानि अपना बैंड बनाया। विचारों को संघ में बदलने का कार्य हेडगेवार जी ने किया लेकिन दूसरे सरसंघचालक गुरुजी ने काफी कुछ संघ की लेआउट तैयार की। संगठन का स्वरूप को अधिक परिपक्व किया। एक संगठित हिन्दू सामाजिक संगठन जो किसी आपातकालीन स्थिति में अपने देश के लिए खड़ा होने में पूर्ण तरह सक्षम है, आज हजारों पूर्णकालिक प्रचारकों, लाखों स्वयंसेवकों और 60 से अधिक अलग अलग क्षेत्र में कार्यरत संगठनों को लेकर दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है। संघ की दशकों की मेहनत के बाद आखिरकार 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार के साथ हिंदुत्व के विचार सत्ता पर स्थापित हुए। और भारत अनौपचारिक हिन्दू राष्ट्र बन गया।



सैकड़ों वर्षों की अथक प्रयास, लाखों लोगों के बलिदान, सैकड़ों हुतात्माओं को खोने के बाद हमारे जीवन काल में भारत की सत्ता पर हिंदुत्व स्थापित होते हुए देखना हमारे लिए सौभाग्य है। हिन्दू विचारों के सत्ता पर आते ही केवल 6 वर्ष में अयोध्या में मन्दिर बनना आरम्भ हो गया। काशी विश्वनाथ का कायाकल्प हो गया। कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय हो गया। पूर्वी प्रदेशों में आतंकियों ने हथियार डाल दिए। वामपंथ केरल तक सिमित हो गया। पड़ोसी दुश्मन भिखारी हो गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि मजबूत हो गयी। 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए। सेना मजबूत हो गयी। एक साथ दोनों मौर्चों पर लड़ने में सक्षम हो गए। अगर 6 वर्ष में इतना सब कुछ हो गया तो 70 साल में कितना कुछ हो सकता है। खैर अब समय है, आधिकारिक हिन्दू राष्ट्र बनने का। आधिकारिक हिन्दू राष्ट्र मुस्लिम देश की तरह नही होगा। न ही ईसाई राष्ट्र की तरह होगा। यह हिन्दू राष्ट्र अपनेआप में अलग होगा और दूसरों के लिए श्रेष्ठ उदाहरण होगा। अभी हमने किसी ने हिन्दू राष्ट्र नही देखा (वर्तमान में नही देखा लेकिन इतिहास में चन्द्रगुप्त मौर्य शासनकाल, मराठा साम्राज्य, इनसे भी विक्रमादित्य शासन, श्री कृष्ण द्वारा उल्लेखित न्याय एवं शासन व्यवस्था और विश्व का सर्वोत्तम शासन व्यवस्था राम राज्य, इन सभी को हम भविष्य के हिन्दू राष्ट्र के लिए अपना स्वरूप मान सकते हैं).. इसलिए तरह तरह के अनुमान लगाये जाते हैं। विरोधी और शत्रु लोग अफवाह फैलातें हैं। मुस्लिम देशों से तुलना करते हैं। लेकिन क्या दूसरे धर्म पर आधारित राष्ट्रों को देखकर हिन्दू राष्ट्र कैसा होगा समझा जा सकता है क्या? सबसे शुरू में दो उदाहरण इसी लिए थे।




खैर 800 वर्ष से लड़ते लड़ते आज हम हिंदुत्व को सत्ता तक ले आये हैं। यह बड़ी उपलब्धि है। हमे समाज को और अधिक मजबूत बनाना होगा। अपने राष्ट्र को अधिक मजबूत करना होगा। हम हिन्दू हैं और हमारे लिए भारत के आलावा कोई देश मदद नही करेगा, यह सोचकर हमे अपना सब कुछ समर्पित करते हुए देश के लिए कार्य करना होगा। और फिर से भारत को दुनिया का सबसे शक्तिशाली, वैभवशाली राष्ट्र बनाना होगा जिसकी आने वाली पीढियां और अनेकों शताब्दियों तक वर्तमान पीढ़ी की प्रयासों की सराहना होती रहे। हम स्वयं को आने वाली पीढ़ियों के लिए गर्व करने का अवसर बनाएं।


आज हिन्दू राष्ट्र के विजन को रखकर कार्य करने वाले, मराठा साम्राज्य की नीव रखने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज की 390वीं जयंती है। साथ ही संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरूजी की भी जयंती है। इस चर्चा के लिए इससे ज्यादा शुभ दिन हो ही नही सकता था।

जयतु भारतम्

जयतु हिंदुराष्टम

स्वामी विवेकानंद की महत्वता




स्वामी विवेकानंद के 157वें जयंती पर आज देश-दुनिया में भारतीय समुदाय व् भारतीय सनातन विचारों के प्रेरणा लेने वाले अनगिनत लोगों ने स्वामी जी के कार्यों को याद किया, उनके स्वप्न पर विचार किया, उनके कथनों को नई पीढ़ी को बताया और भविष्य में विवेकानंद जी द्वारा तय किये गये लक्ष्यों को कैसे प्राप्त करना है, पर चिंतन किया।

स्वामी विवेकानंद युवा शक्ति के प्रतीक है और उनकी जयंती राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में मनायी जाती है। युवा दिवस के मौके पर पुरे भारत में युवाओं से सम्बन्धित कार्यक्रम हुए तो कंही संगोष्ठी द्वारा राष्ट्र के लिए जीवन जीने को प्रेरित किया गया।

स्वामी विवेकानंद जयंती को सिर्फ पुष्प अर्पित करने के दिन तक सिमित रखना हमारी बहुत बड़ी भूल होगी। यह हमारा सौभाग्य है कि स्वामी विवेकानंद जैसा व्यक्तित्व उस समय भारत में उभर कर आ गया जब उसकी बहुत जरूरत थी।

करीब 800 सालों से लगातार चले आ रहे इस्लामिक राज जिसमे भारत की संस्कृति और विचारों को कुचलने का भरसक प्रयास किया गया। भारत की आत्मा जोकि सनातन धर्म है, उसपर सीधा वार हुआ। भारतीय विचारों, परम्पराओं, मूल्यों के नीव के रूप में विद्यमान तमाम मठो, मन्दिरों, गुरुकुलों को ध्वस्त कर दिया गया। भारत के लोग अपनी पूजा पद्धति से विमुख होकर इस्लाम को अपना लें, सर्वे भवन्तु सुखिनः यानि सभी सुखी रहें जैसे मूल्यों को त्यागकर सिर्फ अल्लाह ही श्रेष्ट है जैसे कट्टर विचारों को अपनाने पर विवश किया गया, भारतीय जनता के भक्ति और आस्था के प्रतीक व् भारत की चिर पुरातन इतिहास के प्रत्यक्ष गवाह मन्दिरों जिसमे मुख्यतः श्री राम मन्दिर अयोध्या, कृष्ण मन्दिर मथुरा, काशी विश्वनाथ हैं जैसे तमाम मन्दिरों को तोड़कर मस्जिद बना दी गयी। भारतीय सनातन धर्म की यह विशेषता है कि इसके पास आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक नेतृत्व के एक सिलसिलेवार रूप से कड़ी मौजूद रही है। ऐसा नेतृत्व किसी अन्य सम्प्रदाय या पंथ में नही है। इस्लामिक राज में आर्थिक – सामाजिक -  राजनैतिक नेतृत्व और सहभागेदारी वाले नीवं पर जोरदार प्रहार हुआ और सामाजिक व् राजनैतिक नेतृत्व को जर्जर कर दिया गया। इसके बाद 200 के ब्रिटिश काल में आर्थिक रूप से भी भारत को जर्जर कर दिया गया। यंहा पर उत्पादन हो ही न सके, उसके लिए कानूनन बाध्य किया गया। भारत के लोग भारतीय मूल्यों/विचारों को पढ़ ही न सके, इसके लिए सभी गुरुकुलों पर प्रतिबन्ध लगाकर अंग्रेजी स्कूल खोल दिए गये। भारत के लोग भारतीयता को भूल जाएँ और यूरोपियन सभ्यता को अपना लें या कहें ईसाईयत को अपना लें, इस पर विवश किया गया।

अंग्रेजो के काम करने का तरीका इस्लामिक राजाओं से अलग था। इस्लामिक राजाओं ने ताकत के बल पर अपना काम किया ठीक वैसे ही जैसे एक विशाल पेड़ को कुल्हाड़ी के जरिए काटने की कोशिश की जाये। जबकि अंग्रेजो ने यही काम साम, दाम, दंड, भेद की नीति को अपनाकर किया। यानी एक विशाल पेड़ को काटने के लिए सिर्फ कुल्हाड़ी का इस्तेमाल ही नही किया बल्कि उसकी जड़ काटकर व् उसमे जहर डालकर सुखाने जैसा काम किया।

इस्लामिक अत्याचार से उभरने को समय समय पर कई भारतीय राजा उभरे, चाहे वो उत्तर में सिख हों, मध्य में मराठा, दक्षिण में विजयनगर सम्राज्य। अंग्रेजो से भी लड़ाई लगातार जारी रही लेकिन भारत 1850 आते आते जर्जर हो चला था। सन 1857 में एक क्रांति हुई, जोकि पूरा दम लगाकर लड़ी गयी लेकिन कारण जो रहे हों, यह असफल हो गयी। भले ही यह असफल हो गयी, लेकिन इस क्रांति पर लिखी सावरकर की पुस्तक ‘भारत का स्वतंत्रता समर’ में बताया गया है कि इस क्रांति को करने में किस प्रकार भारतीय जनमानस ने एक बड़ी कोशिश की थी।

एक असफल कोशिश 1857 के बाद भारत में एक प्रकार से स्थिरता आ गयी। अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ खड़ा होने के लिए छुटपुट घटनाएँ जरुर हुई लेकिन  कोई भी ब्रिटिश साम्राज्य को तनिक भी हिला दे ऐसी कोइ कोशिश नही हुई। अब जब भारत के पास राजनैतिक नेतृत्व बचा नही, आर्थिक तौर पर हम जर्जर हो चुके थे, सामाजिक तौर तरीके बिगड़ चुके थे, समाज गरीबी से जिकड़ा हुआ था, भूख से बेहाल था ऐसे में इस समाज को, भारत को दोबारा कैसे खड़ा किया जाये, टूटे हुए मन को कैसे संभाला जाये, मरे हुए स्वाभिमान को दोबारा कैसे जागृत किया जाये, यह सबसे बड़ा सवाल था।

अगर यही प्रतिकूल स्थितियां किसी भी देश के सामने होती तो शायद वो देश हमेशा के लिए घुटने टेक देता, और यही ब्रिटिश लोगों को भी लगा कि भारत को जिस तरह से उन्होंने बर्बाद किया है, यह देश दोबारा खड़ा नही हो पायेगा और न ही उनका राज यंहा से कभी समाप्त होगा। इसके बाद उन्होंने भारत से पैसा इंग्लेंड ले जाना कम करके यंही स्थायी निवास बनाने, आदि में खर्च करने लगे क्योकि वो निश्चिंत थे की भारत अब नही उठ सकेगा। 

भारत के पास एक ऐसी शक्ति है जो किसी के पास नही वो है अध्यात्म। अध्यात्म भारत की रीढ़ है। अध्यात्म के द्वारा भारत में विभिन्न पन्थ, भाषा, रंग रूप, कार्य, रहन सहन होने के बाबजूद एकता रही है। भारत के पास जब कुछ नही था, तब सिर्फ अध्यात्म के द्वारा ही भारत के जनमानस को दोबारा जागृत किया जा सकता था। हमारे इतिहास, सनातन विचारों/मूल्यों को अगर हम पढ़े और समझे तो भारत गरीबी, भुखमरी के बाबजूद स्वाभिमान के जगने के कारण और अपनी मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम व् कर्तव्य के बोध हो जाने के कारण विदेशी दासता के विरुद्ध खड़ा हो सकता है, यह उस समय की सच्चाई थी। 1857 की असफलता के बाद इसी अध्यात्म के जरिए भारतीय जनमानस में चेतना का प्रसार करने का कार्य स्वामी विवेकानंद ने किया।

12 जनवरी 1863 को जन्मे नरेंद्र ने 1887 में सन्यास ग्रहण कर लिया और सम्पूर्ण जीवन भारत भूमि के लिए दे दिया। सिर्फ 24 वर्ष की आयु में अपने देश व् समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध नरेंद्र को हो गया और इसमें एक बड़ी भूमिका 1881 में हुई राम कृष्ण परमहंस से प्रथम मुलाकात ने निभाई।

 

स्वामी जी भारत की हालत और विदेशी दासता पर गंभीर थे और एक नयी चेतना का प्रसार करने के लिए उन्होंने 1890 के आसपास पुरे भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की। उनके जन्हा जन्हा कदम पड़े वहाँ अपने धर्म के प्रति, अपने राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का बोध कराने के लिए व् जनमानस को जागृत करने के लिए काफी कार्य हुआ। बंगाल से हिलामय की उंचाईयों में फिर पश्चिम में मौजूदा पाकिस्तान और बाद में महाराष्ट्र होते हुए दक्षिण में गये। और कन्याकुमारी स्थित शिला पर उनका ध्यान मगन हो जाना और एक नये और महान कार्य के लिए समर्पित हो जाने की कहानी पूरी दुनिया जानती है। स्वामी विवेकानंद एक मिशन ने रूप में अपने कार्य को जारी रखना चाहते थे लेकिन शायद वो जानते थे कि उनके पास समय बहुत कम है। इसलिए उन्होंने यह कहा था कि अगर उन्हें अपने जैसे 100 युवा मिल जाएँ तो वो भारत को बदल देंगे। उनका कार्य जारी रहता इसी बीच अमेरिका के शिकागो में होने जा रहे विश्व धर्म सम्मेलन के बारे में उनको बताया गया और उनसे भारत के सनातन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में दरअसल सनातन धर्म के रूप में न कहकर भारत के प्रतिनिधि के रूप  में कहा जाये तो ठीक रहेगा, वो वहाँ जाए ऐसा आग्रह किया गया। मई 1893 में अमेरिका की तरफ उन्होंने यात्रा प्रारम्भ की और कनाडा होते हुए अमेरिका के शिकागो पहुंचे। एक सन्यासी भेष में अमेरिका से अनजान व्यक्ति जिसके पास ज्यादा धन भी नही, उसकी स्थिति क्या होगी यह हम समझ सकते हैं। भारतीय ज्ञान, विचारों, मूल्यों से भरे एक व्यक्ति ने अमेरिका की धरती पर कदम रखा, शायद यह अमेरिका के लिए बहुत बड़ा सौभाग्य था। जिनसे भी स्वामी जी की वहाँ भेंट हुई, वो सभी लोग स्वामी जी से न सिर्फ प्रभावित हुए बल्कि इनके शिष्य बन गये।

विश्व धर्म सम्मेलन कहने को तो दुनिया भर के अलग अलग पन्थो, सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन था पर इसका एक हित इसाइयत की श्रेष्ठता दिखाने से जुड़ा था और यह बताने से भी की यूरोप और अमेरिका के लोग ही सभ्य हैं, इन्होने ही सब कुछ दुनिया को दिया है बाकि दुसरे लोग असभ्य हैं।

कारण कुछ भी रहे हों, लेकिन इतना बड़ा मंच जब भारत को अपनी बात दुनिया भर में पहुँचाने के लिए मिला था तो स्वामी जी ने इसका उपयोग किया। उनका प्रथम व्याख्यान जोकि 11 सितम्बर को हुआ वो आयोजन समिति द्वारा दया स्वरूप दिए गये बेहद कम समय में हुआ। आयोजन के बारे में सम्पूर्ण जानकारी न होने के कारण स्वामी जी अपने भाषण से पहले होने वाली जरूरी पंजीकरण नही करा सके थे इसलिए 11 सितम्बर को उन्हें सिर्फ इतना समय दिया गया जिससे वो अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें।

जब स्वामी विवेकानंद ने अपनी बात रखना शुरू किया तो दुनिया देखती रह गयी। जितना समय उन्हें बोलने के लिए दिया गया उतना समय तो सिर्फ तालियाँ ही बजती रही। दुनिया को भारत अपने ज्ञान के सागर से कुछ बुँदे दे रहा था और दुनिया अभिभूत होकर सिर्फ बूंदों को अंगीकृत करने को बेताब थी। भारतीय आदर्श विचारों और मूल्यों की जो झलक बेहद कम शब्दों में स्वामी जी ने वहाँ दिखाई वो दुनिया भर के लिए अचरज बन गया और दुनिया भर के पन्थ, सम्प्रदाय एक पल में भारत के विचारों के सामने बौने हो गये। स्वामी विवेकानंद ने जिस तरह अपनी बात को रखा उसमें सर्व धर्म समभाव की बात भी थी, भारत के हजारों लाखों साल पुराने इतिहास की बात भी थी और सबसे अलग श्रेष्ठता के साथ दूसरों को स्वीकार करने की धारणा भी थी।

इस एतिहासिक व्याख्यान ने भारत के बारे में सोचने का नजरिया दुनिया का बदल दिया और अगले दिन जब मीडिया ने इस सम्मेलन की खबर छापी तो विवेकानंद का भाषण उसमे मुख्य था। मीडिया ने स्वामी जी को “Cyclonic monk from India” कहा। एक अख़बार New York Herald ने छापा कि “Vivekanand is undoubtly the greatest figure in the parliament of religion After the hearing him, we feel how foolish it is to send missionaries to this learned nation” यानि बिना किसी संशय के विवेकानंद धर्म सम्मेलन में सबसे महान व्यक्तित्व हैं। उनको सुनने के बाद हम मानते हैं कि एक साक्षर देश में मिशनरीज को भेजना बड़ी मुर्खता है।

स्वामी विवेकानंद ने तब दुनिया में व्याप्त भारत की जर्जर छवि को बदलकर एक महान राष्ट्र की बना दी। 27 सितम्बर को दुसरे और अंतिम व्याख्यान के बाद स्वामी जी दुनिया में प्रसिद्ध हो गये और भारत की तरफ लोग आकर्षित हुए। इसके बाद कई विषयों को लेकर अमेरिका की कई विश्वविद्यालयों  में उनके भाषण हुए। कई सामाजिक संगठनों के द्वारा उनको सुनने के लिए संगोष्ठियाँ आयोजित हुई। जंहा भी स्वामी जी गये वहाँ लोगों ने भारत को जाना, इसकी संस्कृति को जाना और स्वामी जी के शिष्य बन गये।

अमेरिका के बाद यूरोप की यात्रा हुई। यूरोप भी भारत के सन्यासी को पाकर मानो ख़ुशी से झूम उठा। जिन सवालों के उत्तर तब यूरोपीय समाज के पास नही था, उनके धार्मिक पुस्तकें क्या करना है,, यह तो बताती थी लेकिन क्यों करना है नही बताती थी। जीवन में आई समस्याओं को लेकर उनके पास जिस ज्ञान का शून्य था उसको विवेकानंद ने भर दिया। उनके व्याख्यान सुनने भीड़ उमड़ती थी। नेपाल, श्री लंका के बाद 1897 में भारत आये। दुनिया भर में भारतीय सन्यासी की चर्चा जब भारत में पता चली तो यंहा की मीडिया भी प्रमुखता से छापने लगती। भारत विवेकानंद जी का मानो इंतजार कर रहा हो। रामेश्वरम में भव्य स्वागत हुआ। 1 मई 1897 को उन्होंने अपने लक्ष्य जिसपर वो अमेरिका यात्रा से पहले लगे थे पर दोबारा कार्य प्रारम्भ करते हुए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसके बाद 1899 में अमेरिका यात्रा, 1900 में यूरोप व्  विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा की। स्वामी विवेकानंद की इन यात्राओं का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह हुआ कि हर जगह भारत के विचारों से प्रेरित लोगों के सेंटर स्थापित हुए। भारत की संस्कृति का बिना किसी लालच और दंड का उपयोग करते हुए (जैसा कि उस समय भारत में ईसाई मिशनरीज किया करती थी) उसका प्रचार और प्रसार किया। भारत के अध्यात्म को दुनिया भर में ले गये साथ ही भारत में जनमानस में चेतना का प्रसार करने का कार्य जारी रहा। एक सन्यासी के रूप में पुरे देश में उनकी यात्राओं ने लोगों को प्रेरणा दे और जो स्थिरता ब्रिटिश विरोधी कार्यों में आ गयी थी वो समाप्त हो गयी।

स्वामी जी अच्छी तरह जानते थे कि भूखे लोगों के हाथ में हथियार देकर युद्ध  नही लड़ा जाता इसलिए उन्होंने सारा लक्ष्य भारतीय जनमानस को समस्याओं से उभारने में समाहित किया। उन्होंने भारत में उन सब रिवाजों, परम्पराओं का विरोध किया जिनके लिए अब भारत में जगह नही होनी चाहिए। उनका मानना था कि विदेशी ताकत से लड़ने के लिए राष्ट्र में एकता का भाव होना चाहिए और जो भी आपसी एकता को नुकसान पहुंचा रही है उसको उखाड़ के फ़ेंक दो। हिन्दू धर्म को सनातन इसलिए ही कहते हैं कि इसमें समय के अनुसार ढलने की स्वतंत्रता है। पुराने से पुराने और नये से नये विचारों को रखने वाला ही  सनातन धर्म कहलाता है।

स्वामी जी ने भारतीय समाज को बाहर निकलने का आह्वान किया और राष्ट्र के लिए कार्य करने व् जीने के लिए कहा। उन्होंने प्रगतिशील विचारों के साथ एकता स्थापित करने का प्रयास किया जोकि समय की जरूरत थी। यह स्वामी जी का ही प्रभाव था कि जब महात्मा गाँधी ने आन्दोलन किये तो बहुत बड़ी संख्या में भारतीय जनमानस घर से बाहर निकला। स्वामी जी के विचारों ने कई लेखकों, विचारकों को जन्म दिया। बौद्धिक क्रांति शुरू हुई। ब्रिटिश साम्राज्य की नीव पर वार हुए। स्वामी जी के विचारों में सबसे अहम था युवाओं की भूमिका। उन्होंने युवा शक्ति को सबसे पहले पहचाना। राष्ट्र के लिए युवा क्या कुछ कर सकते हैं, उन्होंने इस पर बहुत बताया। राष्ट्र के लिए उसके युवा अनमोल धरोहर है, अगर युवा शक्ति ठान ले तो क्या नही हो सकता, इन्ही विचारों ने उनको युवा शक्ति का ब्रांड अम्बेसडर बना दिया। उनको युवाओं के बेहतर स्वास्थ्य पर जोर दिया तो फुटबॉल खेलने को प्राथमिकता देते हुए जीवन में खेल और व्यायाम की जरूरत को बताया। युवाओं के स्वास्थ्य के आलावा ज्ञान और चरित्र पर उन्होंने जोर दिया।

रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है कि “अगर आपको भारत को जानना है तो स्वामी विवेकानंद को पढो”

जिस अतीत से निकलकर राष्ट्र भविष्य की सीढी चढ़ रहा है, उस अतीत को अस्वीकार करना बुद्धिता नही है। अतीत की नीव पर ही राष्ट्र का निर्माण होगा। युवा वर्ग में यदि अपने विगत इतिहास के प्रति कोई चेतना न हो तो उनकी दशा प्रवाह में पड़े एक लंगरहीन (जिसका कोई रुकने का लक्ष्य न हो) नाव के समान होगी। ऐसे नाव कभी अपने लक्ष्य पर नही पहुंचती। हमारा आगे बढना लेकिन कोई लक्ष्य न होना यह हमारी प्रगति की निष्फलता को दर्शाता है। इन विचारों के साथ स्वामी जी ने राष्ट्र पुनर्निर्माण की आवश्यकता और राष्ट्र के लक्ष्य तय होना, दोनों पर जोर दिया है। आज भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण करने के लिए विश्वगुरु लक्ष्य के साथ दुनिया का सबसे बड़ा विद्यार्थी संगठन अपना कार्य लगातार कर रहा है।

स्वामी जी के द्वारा किये गये कार्य अद्वितीय थे। स्वामी जी के पास विचार थे, उन्होंने कार्य भी किया लेकिन समय कम था। केवल 39 वर्ष की अल्पायु में स्वामी विवेकानंद इस दुनिया को छोडकर चले गये। स्वामी विवेकानंद ने कहा था की उन्नति का आधार स्वाधीनता है। उनके ये शब्द हजारों क्रांतिकारियों को जन्म दे गये। सावरकर ने जो विचार दिए वो विवेकानंद जी उनके मूल हो सकते हैं। हजारों वर्ष की गुलामी के बाद भारत अपने को भूल चुका था, उसको दोबारा अपने ज्ञान-अध्यात्म से परिचय कराने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को ही जाता है।

स्वामी विवेकानंद के कार्यों को आज आगे बढ़ाने की जरूरत है। स्वाधीनता प्राप्त हो चुकी है, अब राष्ट्र पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी हमारे कंधों पर है। हजारों वर्ष की गुलामी के बाद जर्जर पड़े घर की हालत ठीक करने का समय है। फिर से आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक नेतृत्व खड़ा करने की जिम्मेदारी है। भारत के पास मजबूत से मजबूत राजनैतिक नेतृत्व हो यह हमे सुनिश्चित करना है। भारत के मजबूत से मजबूत आर्थिक हालात हो यह हमे सुनिश्चित करना है। भारत के समाज में एकता और विचारो/परम्पराओं का प्रवाह लगातार विद्यमान रहे, संस्कृति जीवंत रहे, यह हमे सुनिश्चित करना है। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा युवा राष्ट्र है। युवाओं के कंधे पर ही देश का भविष्य है, यह बात अच्छी तरह देश के हर युवक-युवती को समझनी होगी। हमारे कार्य करने, राष्ट्र पुनर्निर्माण के लिए चिंतन करने का सेंटर हमारे विद्यालयों-महाविद्यालयों को बनाना होगा। तोड़ो नही जोड़ो की नीति से राष्ट्रहित के साथ युवाओं को अपनी पढाई के साथ देश में क्या हो रहा है, इसपर पैनी नजर रखनी होगी।

देश के सामने आज क्या समस्याएँ है इसपर सोचना होगा। आने वाले भविष्य में क्या चुनौतियाँ उभर सकती हैं, उनपर आज से ही कार्य करना होगा। देश के सामने क्या खतरे हैं, उनको समाप्त करना होगा। भविष्य में भी कोई खतरा न उत्पन्न हो उसपर कार्य करना होगा। संगठन हर किसी के लिए जरूरी है, लेकिन अगर हमे लगता है कि हालात हमारे अनुसार नही है तो एकला चलो रे की नीति अपनानी ही क्यों न पड़े, लेकिन राष्ट्र के लिए हर युवा को कार्य करना होगा। स्वामी विवेकानंद के सामने भी कई चुनौतियाँ आई लेकिन उन्होंने अकेले ही अपना पथ चुना और बाद में परचम लहराया।

यह हमारा सौभाग्य है कि जिस सपने को एक नरेंद्र ने 19वीं सदी में गढ़ा था आज 21वीं सदी में उन्ही सपनों को पूरा करने के लिए एक नरेंद्र कार्यरत है।