प्लेटो और अरस्तू पर भारतीय दर्शन की छाप
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नें जब विकसित भारत के लक्ष्य को
राष्ट्र के सामने रखा तब उन्होंने कहा था कि किसी भी राष्ट्र के जीवन में एक ऐसा
कालखंड अवश्य आता है जब वह अपनी प्रगति की यात्रा को तेज कर सकता है। वर्ष 2022 से
वर्ष 2047 तक आगामी 25 वर्ष ऐसा ही अमूल्य कालखंड भारत के लिए है। यह भारत के
इतिहास का न सिर्फ निर्णायक युग है बल्कि एक लंबी छलांग लगाने को भी भारत तैयार
है। इस अवधि में केवल नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करना लक्ष्य नहीं है बल्कि जो खो चुका
उसे वापस पाना और जो भुला चुके उसपर पुनः अधिकार साबित करना भी एक कार्य है। भारत सरकार बहुआयामी तरीके से अमृत काल में
कार्यरत है परंतु महत्वपूर्ण है अकादमिक भागेदारी जिसकी जिम्मेदारी इस देश के
युवाओं विशेषकर शोधार्थियों पर है।
भारत नें अनेक ऐसी विपरीत परिस्थितियों का सामना किया है
जिसमें विश्व की अनेक सभ्यताएं नष्ट हो गईं परंतु एक विशेष ऊर्जा समय समय पर भारत
को जीवंत बनाए रखने के लिए कार्य करती है। भारत की पवित्र भूमि में एक विशिष्ट
ऊर्जा और जीवन शक्ति समाहित है जिसनें न सिर्फ आदि काल से इस धरा को सुरक्षित रखा
बल्कि हर हमले के बाद पुनः शक्ति के साथ खड़ें होने में मदद करी। आज वही ऊर्जा
जागृत हो चुकी है इसलिए हमें राष्ट्र के लिए जुट जाना चाहिए।
ब्रिटिश काल में भारत पर थोपी गई शिक्षा व्यवस्था जोकि
अव्यवस्था में ज्यादा बदल गई, भारत के लिए गंभीर खतरा साबित हुई। लगभग 190 वर्ष
में इस योजनाबद्ध रूप से लागू की गई व्यवस्था नें न सिर्फ भारतीय ज्ञान परंपरा को
लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंचा दिया बल्कि भारतीयों को अपनी ही विरासत और ज्ञान
पर स्वाभिमान न करना भी सीखा दिया। इसी नीति का परिणाम है कि न सिर्फ हमनें अपने
ज्ञान की ज्योति को पश्चिमी चिरागों से कमतर आँका बल्कि हमारी ही रोशनी से
प्रज्वलित पश्चिमी चिरागों की रोशनी वापस भारत आई तो उसकी प्रशंसा करने लगे और
श्रेष्ठ समझने लगे। अपनी मातृभूमि को बौद्धिक स्तर पर पिछड़ा समझने का महापाप भी
भारत कि संतानों ने किया।
आज विषय उन्हीं पश्चिमी चिरागों की रोशनी की समीक्षा करने का
है और देखना है कि कैसे वो हमारी ही रोशनी से प्रज्वलित हुए हैं। उदाहरण के रूप
में हम पश्चिमी राजनीतिक विचार को आकार देने वाले प्राचीन पश्चिमी विचारकों में से
एक – प्लेटो को देखते हैं। प्लेटो ने अपने "रूपविज्ञान के सिद्धांत" (Theory of Forms) में
यह प्रतिपादित किया कि भौतिक संसार, एक सच्चे, शाश्वत और अपरिवर्तनीय तत्त्वों से बनी दुनिया
की, जिन्हें
वह "रूप" (Forms) कहता है, की केवल एक छाया मात्र है। ये रूप ही
वास्तविक ज्ञान के विषय हैं और समस्त यथार्थ का स्रोत भी हैं । अगर भारतीय दृष्टि
से देखें तो यह विचार अद्वैत वेदांत के ब्रह्म (परम सत्य) और माया के सिद्धांत के
अत्यंत समीप है।
उपनिषदों में भी इस विचार की व्यापक चर्चा मिलती है। छांदोग्य
उपनिषद (6.1.4) में कहा गया है: "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" — अर्थात "यह सम्पूर्ण ब्रह्म ही है"। प्लेटो ने अपनी कृति The Republic में गुफा में बंद उन
बंदियों का वर्णन किया है जो केवल दीवार पर पड़ने वाली छायाओं को ही यथार्थ समझते
हैं। यह भारतीय माया के सिद्धांत से निकटता से जुड़ा है, जहाँ अज्ञान (अविद्या)
के कारण व्यक्ति एक झूठे यथार्थ को सत्य मान बैठता है। माया को कभी-कभी
"इल्युज़न" (illusion) के रूप में अनूदित किया जाता है, परंतु यह अनुवाद
पूर्णतः सटीक नहीं है, क्योंकि इल्युज़न क्षणिक होती है, जबकि माया एक चिरस्थायी
आच्छादन है जो तब तक बना रहता है जब तक आत्मा सत्य (ब्रह्म) को न पहचान ले।
प्लेटो ने अपने संवाद
Phaedo
और Timaeus में आत्मा के पुनर्जन्म
और उसके पूर्व कर्मों से जुड़ाव की अवधारणा पर चर्चा की है। वे यह सुझाव देते हैं
कि आत्मा का अगला जन्म उसके पिछले जीवन में किए गए आचरण और कर्मों पर निर्भर करता
है। पाइथागोरस और ऑर्फिक परंपराओं से प्रभावित होकर,
प्लेटो आत्मा की अमरता (immortality of the soul) और पुनर्जन्म (reincarnation)
में विश्वास करते थे। उनके
अनुसार, आत्माएँ अपने कर्मों और स्वभाव के अनुसार विभिन्न शरीरों में
पुनर्जन्म लेती हैं।
यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से भारतीय प्रभाव को दर्शाता है
क्योंकि आत्मा, पुनर्जन्म और कर्मों के आधार पर जन्म मिलने के स्पष्ट सिध्दांत न
सिर्फ भारत में ही हैं बल्कि यहाँ से विश्व में गए। प्लेटो के इन विचारों को
भारतीय ग्रंथों में स्पष्ट देखा जा सकता है। सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद, प्लेटो से
हजारों वर्ष पहले ही इसी विचार को कह रहा है।
ऋग्वेद 10.16.3:
सूर्यं॒ चक्षु॑र्गच्छतु॒ वात॑मा॒त्मा द्यां च॑ गच्छ पृथि॒वीं
च॒ धर्म॑णा । अ॒पो वा॑ गच्छ॒ यदि॒ तत्र॑ ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑ तिष्ठा॒
शरी॑रै
(देहपात के अनन्तर देह तो अपने-अपने कारण पदार्थों में लीन
हो जाता है और जीव स्वकर्मानुसार प्रकाशमय, जलमय, पृथिवीमय लोकों तथा वृक्षादि की जड़योनियों तक
प्राप्त होता है )
इसी प्रकार बृहदारण्यक उपनिषद् 4.4.3 और
श्लोक 4.4.5, छांदोग्य उपनिषद श्लोक
5.10.7 भी
महत्वपूर्ण है।
बृहदारण्यक उपनिषद् 4.4.3 : तद्यथा तृणजलायुका
तृणस्यान्तं गत्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति, एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्य, अविद्यां
गमयित्वा, अन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति
(जिस प्रकार एक जोंक एक तिनके पर टिकी हुई होती है, उसके सिरे तक जाती है, फिर दूसरा सहारा पकड़
लेती है और सिकुड़ जाती है, उसी प्रकार आत्मा भी इस शरीर को एक ओर फेंक देती
है - इसे बेजान बना देती है - दूसरा सहारा पकड़ लेती है और सिकुड़ जाती है।)
बृहदारण्यक उपनिषद् 4.4.5 : स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः
प्राणमयश्चक्शुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः
काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति; यथाकारी
यथाचारी तथा भवति—साधुकारी साधुर्भवति, पापकारी पापो भवति; पुण्यः
पुण्येन कर्मणा भवति, पापः पापेन । अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष
इति; स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति, यत्क्रतुर्भवति
तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते
वह आत्मा वास्तव में ब्रह्म है, साथ ही बुद्धि, मन और प्राण के साथ, आंख और कान के साथ, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश के साथ, अग्नि और अग्नि के
अलावा जो कुछ है, इच्छा और इच्छा की अनुपस्थिति के साथ, क्रोध और क्रोध की
अनुपस्थिति के साथ, धर्म और अधर्म के साथ, हर चीज के साथ - जैसा कि सर्वविदित है, इसके साथ (जो माना जाता
है) और उसके साथ (जो अनुमान लगाया जाता है) पहचाना जाता है। जैसा वह करता है और
कार्य करता है, वैसा ही बन जाता है; अच्छा करने से वह अच्छा बन जाता है, और बुरा करने से वह
बुरा बन जाता है - अच्छे कार्यों के माध्यम से वह पुण्य बन जाता है और बुरे
कार्यों के माध्यम से वह दुराचारी बन जाता है। हालाँकि, अन्य लोग कहते हैं, 'आत्मा
की पहचान केवल इच्छा के साथ होती है। वह जो चाहता है, उसे पूरा करता है; वह जो हल करता है, उसे पूरा करता है; और जो करता है, उसे प्राप्त करता है।'
छांदोग्य उपनिषद श्लोक
5.10.7
- तार्किक संरचना (Logical Structure): दोनों प्रणालियाँ निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए प्रस्तावों (premises) का उपयोग करती हैं।
- कारण और प्रभाव का तर्क (Cause-and-Effect Reasoning): अरस्तू का major premise (जैसे कि “जहाँ धुआँ होता है, वहाँ आग होती है”) न्याय दर्शन के उदाहरण से मिलता-जुलता है।
- सामान्यीकरण का प्रयोग (Use of Generalization): न्याय दर्शन में उदाहरण और उपनय का प्रयोग उस प्रकार की सामान्यता को दर्शाता है जैसा अरस्तू के categorical logic में मिलता है।
- मान्य तर्क का महत्व (Validity-Based Reasoning): दोनों प्रणालियाँ इस बात पर बल देती हैं कि यदि प्रस्ताव सत्य और तर्क संगत हों, तो निष्कर्ष भी सत्य और वैध होगा।
तद्य इह रमणीयचरण अभ्यासो ह यत्ते रमणीयं योनिमापद्येरणब्राह्मणयोनिं
वा क्षत्रिययोनि वा वैश्ययोनिं वाथ य इहा कप्यचरणा अभ्यासो ह यत्ते कप्यं
योनिमापद्येरणश्वयोनिं वा शुक्रायोनिं वा चाण्डालायोनिं वा
इनमें से जिन्होंने इस संसार में (अपने पिछले जन्म में) अच्छे कर्म किए हैं, वे उसी के अनुसार अच्छे जन्म प्राप्त करते हैं। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य
के रूप में जन्म लेते हैं । लेकिन जिन्होंने इस संसार में [अपने
पिछले जन्म में] बुरे कर्म किए हैं, वे उसी के अनुसार बुरे जन्म प्राप्त करते हैं, जैसे कुत्ता, सुअर या जातिहीन
व्यक्ति के रूप में जन्म लेना।
सबसे स्पष्ट तरीके से भगवत गीता भी यही दोहराता
है कि :
श्लोक 2.22 : वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि
गृह्णाति नरोऽपराणि | तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि
संयाति नवानि देही
(जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों
को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए
शरीरों को प्राप्त होता है)
इससे यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि किस प्रकार भारतीय ज्ञान
की ज्योति से यूनान के चिराग प्रज्वलित थे। प्लेटो द्वारा The Republic में वर्णित आदर्श
दार्शनिक-राजा (Philosopher-King) की अवधारणा भी हिंदू ग्रंथों में प्रतिपादित राजधर्म की
संकल्पना से अत्यंत समानता रखती है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में एक राजा में जिन
गुणों का होना आवश्यक बताया गया है—जैसे ज्ञान, संयम, धर्मनिष्ठा, न्यायप्रियता,
और लोक कल्याण के प्रति
समर्पण—वे सभी गुण प्लेटो के आदर्श राजा में भी दिखाई देते हैं। दरअसल, प्लेटो कोई पूर्णतः नई
अवधारणा प्रस्तुत नहीं कर रहे, बल्कि वे उन शिक्षाओं को अपने शब्दों में व्यक्त
कर रहे हैं जो सदियों से भारतभूमि पर राजाधर्म और शासक
की नैतिक ज़िम्मेदारियों के रूप में स्थापित रही हैं। चाहे वह महाभारत
में युधिष्ठिर का धर्मराज होना हो या शुकाचार्य द्वारा राजा को दिए गए उपदेश, हर
जगह यही दृष्टिकोण मिलता है कि एक सच्चा शासक वह है जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुका
हो, इंद्रियों
का संयमी हो, और जनकल्याण को ही अपना सर्वोच्च कर्तव्य माने। इस प्रकार, प्लेटो का
दार्शनिक-राजा भारतीय राजधर्म की विचारधारा की एक प्रतिध्वनि मात्र है, जिसे उन्होंने ग्रीक
सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में ढाला।
अरस्तू
हम अब अरस्तू (384–322
ई.पू.) की बात करते हैं जो कि
पश्चिमी दर्शन के एक महान स्तंभ माने जाते हैं, प्लेटो के शिष्य और सिकंदर के गुरु थे। उनका
योगदान तर्कशास्त्र, तत्वमीमांसा, नीतिशास्त्र, राजनीति, जीवविज्ञान और वाक् शास्त्र सहित अनेक विषयों
में फैला हुआ था, जिससे वे पश्चिमी इतिहास के सबसे प्रभावशाली विचारकों में से
एक बन गए। अरस्तू के विचारों के भारतीय विचारों से कई ऐसे संबंध देखने को मिलते
हैं जो यह संकेत देते हैं कि वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारतीय विचारधारा से
प्रभावित थे।
जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर (Arthur Schopenhauer 1788–1860) ने अपनी प्रसिद्ध कृति "The World as
Will and Representation" में भारतीय और पश्चिमी तर्कशास्त्र के बीच
समानताओं पर चर्चा की है। उन्होंने इंडोलॉजिस्ट विलियम जोन्स (1746–1794) के
अवलोकनों का उल्लेख करते हुए यह दर्शाया कि भारतीय तर्कशास्त्र की गहराई और
सूक्ष्मता पश्चिमी परंपरा के समकक्ष या उससे कहीं अधिक उन्नत है। विलियम जोन्स ने
अपने ग्यारहवें व्याख्यान (11th discourse) में
भारतीय और यूनानी तर्कशास्त्र के बीच संबंध को लेकर एक अत्यंत उल्लेखनीय दावा
प्रस्तुत किया है:
“Here
I cannot refrain from introducing a singular tradition, which prevailed,
according to the well-informed author of the Dabistan, in the Panjab and in
several Persian provinces, that ‘among other Indian curiosities, which
Callisthenes transmitted to his uncle, was a technical system of logic, which
the Brahmins had communicated to the inquisitive Greek,’ and which the
Mohammedan writer supposes to have been the groundwork of the famous
Aristotelian method. If this be true, it is one of the most interesting facts
that I have met with in Asia; and if it be false, it is very extraordinary that
such a story should have been fabricated either by the candid Mohsani Fani or
by the simple Parsi Pundits, with whom he had conversed. But, not having had
leisure to study the Nyāya Sutras, I can only assure you that I have frequently seen
perfect syllogisms in the philosophical writings of the Brahmins and have often
heard them used in their verbal controversies…”
हिन्दी अनुवाद -
“यहाँ
मैं एक विशेष परंपरा का उल्लेख करने से स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूँ, जो
कि दबिस्तान के सुविज्ञ लेखक के अनुसार पंजाब और कई फ़ारसी
प्रांतों में प्रचलित थी—कि ‘अन्य भारतीय जिज्ञासाओं के साथ, जो
कैलिस्टेनीज़ ने अपने चाचा को भेजी थीं, उनमें एक तकनीकी तर्कशास्त्रीय प्रणाली भी थी, जिसे
ब्राह्मणों(भारतीय ज्ञानियों) ने उस जिज्ञासु यूनानी को प्रदान किया था,’ और
जिसे मुस्लिम लेखक प्रसिद्ध अरस्तूवादी विधि की आधारशिला मानते हैं। यदि यह सत्य
है, तो यह एशिया में मेरे द्वारा पाए गए सबसे रोचक
तथ्यों में से एक होगा; और यदि यह असत्य है, तो
यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि ऐसा कथानक या तो निष्पक्ष मोहसनी फानी द्वारा गढ़ा गया
हो या फिर उन सरल पारसी पंडितों द्वारा, जिनसे उसने वार्ता की थी। लेकिन, चूँकि
मुझे न्याय सूत्रों के अध्ययन का अवसर नहीं मिला, मैं
केवल इतना कह सकता हूँ कि मैंने ब्राह्मणों(भारतीय विद्वानों) के दार्शनिक ग्रंथों
में बार-बार पूर्ण न्याययुक्त अनुमान (syllogisms)
देखे हैं और उन्हें उनके
वाद-विवादों में प्रायः सुना है…”
यह उद्धरण यह दर्शाता है कि पश्चिम के विद्वानों ने स्वयं
स्वीकार किया है कि भारतीय तर्कशास्त्र—विशेषकर न्याय दर्शन—में वह गहराई और
प्रणालीबद्धता है, जो यूनानी तर्कपद्धति से भी पहले अस्तित्व में थी, और संभवतः उस पर प्रभाव
भी डाल चुकी थी।
यह विवरण कैलिस्टेनीज़ (Callisthenes
लगभग 370–327 ई.पू.)
से संबंधित है, जो अरस्तू के संबंधी और सिकंदर के राजदरबारी इतिहासकार थे।
कैलिस्टेनीज़, जो सिकंदर की भारत विजय यात्रा का हिस्सा थे, के बारे में माना जाता
है कि उन्होंने पूर्व से पश्चिम में ज्ञान का संचार किया। ऐतिहासिक अभिलेख इस बात
की पुष्टि करते हैं कि उन्होंने बेबीलोन से खगोलशास्त्रीय ग्रंथ ग्रीस पहुँचाए थे, जो इस बात को और अधिक
विश्वसनीय बनाता है कि संभवतः उन्होंने भारतीय तर्कशास्त्र के तत्वों को भी यूनान
में प्रस्तुत किया हो। यह संकेत करता है कि भारतीय ज्ञान भंडार, विशेष
रूप से न्याय दर्शन और तर्कशास्त्र, न केवल उन्नत था,
बल्कि उसने यूनानी दर्शन के
विकास में भी अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया है और यह एक ऐसा पक्ष है जिसे अक्सर
मुख्यधारा के इतिहास में अनदेखा किया गया है।
इस संबंध को और अधिक सुदृढ़ करता है दबिस्तान-ए-मज़ाहिब (Dabistan-i-Madhahib), जो कि 17वीं शताब्दी की एक प्रमुख फारसी रचना है, जिसे मोहसनी फानी - एक कश्मीरी
विद्वान (1615–1670) ने लिखा था। इस ग्रंथ में स्पष्ट रूप से यह
स्वीकार किया गया है कि भारतीय तर्कशास्त्र (तर्क शास्त्र) का ज्ञान यूनान तक
पहुँचा और वहां के दार्शनिकों को प्रभावित किया। इस ग्रंथ में उल्लेख है कि अरस्तू
(जिन्हें इसमें इमाम अरस्तू कहा गया है) ने एक
प्राचीन भारतीय तर्कशास्त्रीय ग्रंथ का अध्ययन किया और उसे एक नई संरचना में ढालकर
यूनानी जगत में प्रस्तुत किया, जो बाद में अरस्तू की तर्कशास्त्र प्रणाली (Aristotelian Logic) के
रूप में प्रसिद्ध हुई। साथ ही, फारसी स्रोतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि सिकंदर
ने भारत में प्राप्त वैज्ञानिक ज्ञान - जिसमें तर्क,
खगोलशास्त्र, गणित और आयुर्वेद जैसी
शाखाएँ शामिल थीं - का यूनानी भाषा में अनुवाद कराने का आदेश दिया था।
ये बातें यह संकेत देती हैं कि भारत का तर्कशास्त्र केवल एक
उपमहाद्वीपीय परंपरा नहीं था, बल्कि उसका प्रभाव विश्व दर्शन की अन्य धाराओं विशेषकर
यूनानी दर्शन पर भी पड़ा। इससे यह भी सिद्ध होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा
वैश्विक दार्शनिक संवाद का एक सक्रिय और प्रभावशाली भाग रही है।
ये सभी संदर्भ इस ओर संकेत करते हैं कि भारतीय तर्क परंपराएँ, विशेष रूप से न्याय
दर्शन, अरस्तू के तर्कशास्त्र (Aristotelian
Logic) को प्रभावित कर रही थीं। न्याय की
पाँच-चरणीय तर्क-पद्धति (अनुमान) अरस्तू के
syllogism से गहरी समानता रखती है, जिससे भारत और यूनान के
बीच पार-सांस्कृतिक बौद्धिक आदान-प्रदान की धारणा को बल मिलता है। भारत और यूनान
के बीच बौद्धिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया संभवतः अरस्तू से भी पहले प्रारंभ हो
चुकी थी, जिसका प्रमाण डेमोक्रिटस (लगभग 460–370 ई.पू.)
की यात्राओं से मिलता है। डेमोक्रिटस एक पूर्व-सॉक्रेटिक दार्शनिक थे, जो अपनी परमाणु
सिद्धांत (Atomic Theory) के लिए प्रसिद्ध हैं। Lives of the Eminent
Philosophers में डायोजेनीज़ लाओर्तियस के अनुसार, डेमोक्रिटस ने व्यापक
यात्राएँ कीं—मिस्र में पुजारियों से ज्यामिति सीखी,
फारस में काल्दीयों के साथ
अध्ययन किया, और संभवतः भारत के
जिम्नोसोफिस्ट्स (भारतीय सन्यासी व
दार्शनिक) के साथ भी संवाद किया। डेमोक्रिटस को एक उत्साही और संसाधनों से समृद्ध
यात्री माना जाता था, इसलिए यह संभावना पूरी तरह से अस्वाभाविक नहीं
है कि वे भारत आए हों। इससे यह संकेत मिलता है कि यूनानी विचारक अरस्तू से काफी
पहले ही भारतीय दर्शन और तर्कशास्त्र की परंपराओं से परिचित हो चुके थे। बाद के
वर्णन जैसे कि कैलिस्टेनीज़ द्वारा सिकंदर के समय में भारतीय तर्कशास्त्र को यूनान
लाया जाना इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत में अरस्तू के युग से पहले ही एक
पूर्ण विकसित और परिपक्व तर्क प्रणाली विद्यमान थी।
यूनानियों ने भारतीय तर्कशास्त्र की प्रणाली को सीधे अपनाया या
यह ज्ञान अनेक माध्यमों से होकर गया परंतु भारतीय और यूनानी तर्कशास्त्र के बीच
समानताएँ इस बात का संकेत हैं कि उस काल में विभिन्न सभ्यताओं के बीच तर्क, तत्वमीमांसा और विचार
प्रक्रिया को लेकर एक गहन बौद्धिक संवाद हुआ था जिसनें पश्चिमी विचारों को जन्म
दिया जिसे बाद में प्लेटो और अरस्तू से भी देखने को मिला। यह सब मिलकर इस विचार को और सशक्त बनाता है कि
भारतीय तर्कशास्त्र एक स्वतंत्र, परिष्कृत और उन्नत परंपरा थी, जिसने संभवतः यूनानी
चिंतन पर परोक्ष रूप से प्रभाव डाला।
अरस्तू का syllogism तीन चरणों में तर्क की एक विधि है, जो इस प्रकार है:
1. Major Premise (सामान्य प्रस्ताव) – एक सामान्य कथन
2. Minor Premise (विशेष प्रस्ताव) – एक विशेष या विशिष्ट कथन
3. Conclusion (निष्कर्ष) – उपरोक्त प्रस्तावों से निकला तार्किक निष्कर्ष
यह deductive reasoning की पद्धति है,
जिसमें यदि प्रस्ताव सत्य हों, तो निष्कर्ष भी
अनिवार्य रूप से सत्य होगा।
इसी प्रकार, न्याय दर्शन—जिसकी स्थापना गौतम ने
की थी—ने पाँच चरणों वाली अनुमान (तर्क/निष्कर्ष) की पद्धति विकसित की, जो इस प्रकार है:
- प्रतिज्ञा (Pratijna) – वह कथन जिसे सिद्ध करना है
- हेतु (Hetu) – दावे का कारण
- उदाहरण (Udaharta) – समर्थन में दिया गया उदाहरण (आमतौर पर प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित)
- उपनय (Upanaya) – उदाहरण को वर्तमान मामले पर लागू करना
- निगमन (Nigamana) – अंतिम निष्कर्ष
तुलनात्मक विश्लेषण:
यह तुलना दर्शाती है कि भारत और यूनान की प्राचीन तर्क परंपराएँ लगभग समान थी और संभवतः यूनान भारत से प्रभावित था।
अरस्तू
की निकोमैकीयन एथिक्स (Nicomachean Ethics) में पुण्य (virtue) और नैतिक चरित्र (moral character) पर विशेष बल दिया गया है, यह भी हिंदू धर्म की
अवधारणा के अत्यंत समीप है। जिस प्रकार अरस्तू यूडेमोनिया (Eudaimonia) यानी मानव कल्याण और आत्म-विकास को जीवन का अंतिम लक्ष्य मानते हैं,
उसी प्रकार भारतीय दर्शन मोक्ष (Moksha) को जीवन का परम उद्देश्य मानता है।
अरस्तू द्वारा वर्णित चार कारण—भौतिक (Material), रूपात्मक (Formal), कर्ता कारण (Efficient), और अंतिम कारण (Final)—भारतीय सांख्य दर्शन की प्रकृति (Prakriti) और पुरुष (Purusha) की मूलभूत अवधारणाओं से मेल खाते हैं, जो अस्तित्व के आधारभूत तत्व माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त, अरस्तू की जीवों और तत्वों की श्रेणियों की संगठित व्यवस्था भारतीय वैशेषिक दर्शन की परमाणु सिद्धांत (atomic theory) से भी मिलती-जुलती है। प्राचीन भारतीय दार्शनिक, जैसे कणाद (छठी शताब्दी ई.पू.), ने परमाणु संबंधी सिद्धांतों का निर्माण यूनानी एटोमिज़्म (Atomism) के उदय से काफी पहले ही कर लिया था। यह तुलनात्मक अध्ययन दर्शाता है कि भारतीय और यूनानी दर्शन में केवल समानताएँ ही नहीं थीं, बल्कि भारतीय चिंतन कई क्षेत्रों में अग्रगामी भी था। इसका प्रभाव यूनान पर पड़ा और वहाँ के विचारों में यह झलक रहा है।
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