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हिन्दू राष्ट्र का मार्ग - संविधान सभा व सरकार की भूमिका




स्वतंत्रता के 75 वर्ष वाद वह समय आगया है जब भारत स्वयं के महत्त्व को विश्व स्तर पर पहचानने लगा है। विश्व बन्धुत्व और शांति के मार्ग पर वर्तमान समय में भारत से बेहतर प्रयास किसी भी देश के नहीं है। विश्व राजनीति में रूचि रखने वाले विश्व के विभिन्न संस्थान और अलग-अलग देशों में नीति निर्धारण में प्रमुख योगदान निभाने वाले थिंक टैंक अपनी रिपोर्ट में बता रहे हैं कि भारत अप्रत्याशित तरीके से महत्वपूर्ण भूमिका में आ रहा है। भारत सिर्फ आर्थिक ही नहीं, सैन्य ही नहीं बल्कि कुटनीतिक स्तर पर अपने स्वयं के विवादों से भी आगे बढ़ विश्व में उपस्थित अन्य विवादों, मसलों और चिन्तन समूहों में भी समाधान करने में अग्रणी बन रहा है। एक दशक में भारत ने पश्चिमी देशों के समूहों की सदस्यता प्राप्त करने वाले प्रयासों से आगे बढ़ स्वयं के द्वारा समूह बनाने और दुनिया को उसमें शामिल करवाने की जो शक्ति प्राप्त करी है वो अप्रत्याशित है। वर्तमान समय में इजराइल और फिलिस्तीन विवाद पर भारत के अतिरिक्त कोई देश नहीं जो समान रूप से दोनों देशों के सम्पर्क में है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी भारत के अतिरिक्त कोई देश नहीं जो भारत से ज्यादा सक्रिय और दोनों पक्षों के साथ चर्चा में है। आर्थिक और सैन्य स्तर पर सर्वोच्चता को पा चुका चीन भी वह विश्वास हासिल करने में नाकाम रहा जो भारत ने पा लिया। यह सब कैसे सम्भव हुआ? आखिर भारत ने कौनसी नीति बदली जिसनें भारत को सफलता दिलाई! यह सवाल दुनियाभर से उठ रहा है और इसका एकमात्र जबाब है, भारत के केंद्र में हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी की सरकार।

यह भारत का दुर्भाग्य रहा कि केंद्र में राष्ट्रवादियों को बहुमत में आते आते 70 साल लग गये। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि शीर्ष राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों में केवल एक ही पार्टी राष्ट्रवादी विचारधारा का समर्थन करने वाली रही। भारत के लोग 70 साल तक स्वयं ही इसे पार्टियों को वोट देते रहे जो स्वयं को राष्ट्रवादी कहने में भी तैयार नहीं हुए।

अगर भारत को वर्तमान में और अधिक मजबूत होना है तो हिन्दू राष्ट्र की तरफ मजबूती से कदम बढाने होंगें। हिन्दू राष्ट्र ही भारत की उन तमाम समस्याओं का समाधान है जिसके कारण हम आज भी कमजोर हैं। सेक्युलर भारत उस बारूद का ढेर है जिसको स्वयं हिन्दू ही बड़ा कर रहे हैं। आज यह बारूद का ढेर इतना बड़ा हो चूका है कि हिन्दू समाज अंदर ही अंदर भयभीत है कि इसमें कहीं से भी चिंगारी न लग जाये। चिंगारी लगाने वाले भारत से बाहर तो काफी हैं ही, भारत के अंदर भी काफी मौजूद हैं। भारत ने 75 साल पहले ही बंटवारा सहा। भारत के दोनों तरफ अपनी ही विशाल भूमि एक ही दिन में विदेशी भूमि हो गयी। हजारों वर्ष पुराने  मन्दिर जिनको बनाने और रखरखाव में हमारे पूर्वजों की सैकड़ों पीड़ियाँ खप गयी, उनको अपने सामने टूटते देखा। लाखों महिलाओं का बलात्कार हुआ, अनेको कम उम्र की लडकियों का अपहरण और जबरन शादी हुई। तकरीबन 10 लाख लोगों की हत्याएं और दशकों तक भूख की तड़प भारत ने झेली। ये सब किसने किया, उन लोगों ने जो स्वयं 1200 साल पहले भारत में कबीलों के रूप में आये।




एक रेप की घटना पर सौ शहरों में कैंडल मार्च निकालने वाला भारत क्या पुनः लाखों महिलाओं के बलात्कार को सह सकता है। क्या जानवरों की रक्षा के लिए भी कानून बनाने वाला भारत लाखों हत्याओं को होता हुआ देख सकता है। क्या कन्यापूजन करने वाला भारत लाखों कन्याओं के जबरन धर्मपरिवर्तन, बलात्कार और हत्याओं को देख सकता है? भला कौन ही चाहेगा ये सब दोबारा हो? लेकिन भारत की नियति कहती है की ये सब देखने के लिए भले ही भारत के लोग तैयार न हों लेकिन हिन्दू ही इस प्रकार की स्थिति बनाते हैं जिससे ये अशुभ समय भी देखने को मिला।

भारत अगर धर्मनिरपेक्ष है तो इसका एकमात्र लाभ मुस्लिमों ने उठाया है। अगर बौद्ध, जैन या यहूदी, पारसी, ईसाई भी धर्मनिरपेक्षता से लाभ उठाते तो समझ आता लेकिन सिर्फ इस्लाम धर्म को मानने वाले ही धर्मनिरपेक्षता से लाभ उठा रहे हैं और भारत क्षद्म इस्लामिक देश बनने की राह पर पहुँच गया। भारत की नीति और सत्ता में इस्लामिक दखल का सीधा अर्थ है 70 साल पहले जो हुआ उसकी पुनरावृति होना। कोई भी भारतीय नहीं चाहेगा कि वह सब दोबारा हो जो सोचना भी खतरनाक है। हिन्दू राष्ट्र बनने से भारत जिस तमाम समस्याओं से बच जायेगा उसपर चर्चा पुनः किसी दिन करेंगे। परन्तु अभी के लिए इसपर चर्चा केन्द्रित रखनी है कि हिन्दू राष्ट्र के लिए किसी राजनीतिक दल की तरफ मुंह उठाकर हिन्दू कब तक देखते रहेंगे। हिन्दू राष्ट्र इस तरह नहीं मिल सकता जिस प्रकार देश की जनता चाह रही है। इसके लिए आलस त्यागना होगा। सरकार को जगाना होगा। सरकार को बताना होगा कि हम धर्मनिरपेक्ष शासन अस्वीकार करते हैं। हमें ‘सेक्युलर भारत’ के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन छेड़ना होगा। धर्मनिरपेक्षता एक नई गुलामी है जिसमें 80% लोग अपने अधिकारों से वंचित हैं। अपने भविष्य के प्रति असुरक्षित हैं। अपने ही देश में विस्थापित हैं। अपने ही सिस्टम से दुत्कारे जाते हैं। हिन्दू राष्ट्र हर भारतीय के लिए प्राथमिकता में होना ही चाहिए क्योकिं हम ही इसे बनायेंगे। धारा 370 हटने पर जिस प्रकार भारत ने जश्न मनाया, वैसा ही जश्न हिन्दू राष्ट्र की स्थापना पर होगा।  अगर सरकार भरोसे बैठे तो उसका सीधा अर्थ है अपने दायित्व से विमुख होना। सरकार से कोई आश न रखने का कहने के पीछे मेरे पास कारण हैं।  

आज भारत की सत्ता पर वही बैठेगा जिसकों भारत के लोग चाहेंगे। सत्ता पर बैठा राजनीतिक दल वही कार्य करेगा जो भारत के लोगों के मन में होगा। सत्ताधारी दल वही कार्य करेगा जो भारत के लोगों के हित में हो, भारत के हित में हो। परन्तु क्या ऐसा सच में हैं? क्या कश्मीर में दो संविधान लागू करने का फैसला भारत की जनता का था? अगर नहीं था तो भारत की तत्कालीन सरकार ने वैसा फैसला क्यों किया? क्या आजादी के बाद भी गोवा को विदेशियों के हाथ में रखे जाने का फैसला भारत के लोगों का था? अगर नहीं था तो गोवा को भारत में मिलाने में 14 साल की देरी क्यों हुई? क्या भारत के लोगों ने कहा हम राम मन्दिर नहीं चाहते? अगर नहीं कहा तो सत्ताधारी पार्टियाँ राम मन्दिर के मार्ग में अवरोध बनकर क्यों खड़ी हुईं।

सच मायने में भारत की स्वतंत्रता मिलने की प्रक्रिया भले ही क्रांतिकारियों ने सुगम बना दी पर ढीले और अयोग्य नेताओं से स्वतंत्रता न संभाली गयी और न ही अच्छे से उस स्वतंत्रता का उपयोग देश की नीव मजबूत करने में किया गया। जिनकों लाठीयों से डर लगा, गोलियों की आवाज से ही रूह काँप गयी, और फांसीं के फंदे सपने में भी देख जाने से शरीर पीला पड़ जाता था वैसे नेताओं की मंडली स्वतंत्रता की घड़ी के समय भारत का शासन अपने हाथ में लेने को खड़ी हो गयी। जो वीर थे, फांसी पर चढ़ चुके थे, जो साहसी थे, गोलियों के सामने खड़े हो गये, जिनकों अपने खून पर गर्व था, उन्होंने संसद में भी बम फेंकने में गुरेज नही किया लेकिन डरपोक लोग जिन्होंने अंग्रेजों की लाठियों के डर से आन्दोलन वापस ले लिया, आन्दोलन में लाठी पड़ने और गोली चलने के किसी भी अवसर को न आने देने के लिए अहिंसा जैसा नारा दे दिया, उनके हाथ में भारत की नीति निर्धारण का फैसला रहा।

मेरा यहाँ उद्देश्य नकारा नेताओं के चरित्र वर्णन का नहीं बल्कि भारतीय आम जनमानस की सक्रियता की कमी को उजागर करने का है। उस समय भी देश की जनता चैन की नींद सोयी रही लेकिन जिन नेताओं के भरोसे देश छोड़ा वो कैसे थे? आज काफी लोग कहते हैं संविधान सभा का बनाया संविधान हम बदलने नहीं देंगे! सत्ताधारी दल भी कहते हैं संविधान सभा द्वारा बनाये संविधान ही महान है, पवित्र है, उसे बदला नही जा सकता। देश की सुप्रीम कोर्ट भी उसी संविधान सभा की पवित्रता के गुणगान करते हुए प्रस्तावना में बदलाव को अस्वीकार कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का स्वरूप नहीं बदलना चाहिए। (दरअसल सुप्रीम कोर्ट की गलतियों पर विशेष प्रकाश किसी दिन डालेंगे और विस्तार से डालेंगे) क्या देश को संविधान सभा द्वारा लिखे गये संविधान के भरोसे रहना चाहिए। कदापि नहीं। संविधान सभा ने जो गलतियाँ करीं, उन्हें सर पर ढोने की परम्परा त्यागनी होगी। संविधान सभा पर भी मुझे भरोसा नहीं है।

संविधान तैयार करने की जिम्मेदारी किसकी थी? अवश्य ही उन नेताओं की जिन्होनें आजादी से पहले अंग्रेजी सरकार के दौरान हुए चुनावों में जीत हासिल की थी। भारत का संविधान तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले वो कुछ सौ लोग अंग्रेजी सरकार के दौरान इलेक्शन जीतकर वहां पहुंचे। क्या यह सम्भव नहीं था कि सिस्टम अपने हाथ में होने के कारण, अंग्रेज चुनावों में हेर फेर कर अपनी पसंद के ही लोगों को चुनाव जीतवा दें। आज इतने मजबूत लोकतंत्र में भी सिस्टम से खिलवाड़ की तमाम खबरें सामने आती हैं। किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति, अपनी राजनीतिक पार्टी के हित में कार्य करता है। क्या अंग्रेजी सरकार में अंग्रेजों की नौकरी करने वाले उनके विश्वासपात्र लोग, किसी भी चुनाव में अंग्रेजों के विरुद्ध काम करने वालों को चुनाव जीतने देते? बिलकुल नहीं। इस तथ्य के आधार पर आजादी के बाद संविधान सभा का निर्माण पुर्णतः नैतिकता के विरुद्ध था और गलत था। अंग्रेजों के ख़ास मेहमानों ने अपनी भूमिका भी इस प्रकार निभाई कि अंग्रेजी सरकार को यह न लगे कि वो लोग अंग्रेजों के दुश्मन हैं। सन 1919 में जलियावाला बाग़ में सारे दरवाजे बंद कर हजारों लोगों को जिनमें बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों की संख्या शामिल थी, उनको गोलियों से भून दिया गया। यह सामूहिक नृशंस हत्या ऐसी थी कि आज भी फिल्मों में यह दृश्य देखकर रूह काँप जाती है। इसी घटना ने इतना गुस्सा भर दिया कि भगत सिंह बचपन में बन्दूकों की फसल उगाने की सोचने लगा। परन्तु उन्हीं अंग्रेजों को आजादी के बाद भी 1950 तक भारत का गवर्नर जनरल बनाये रखने का शर्मनाक कार्य हमारे नेताओं ने किया। यानि एक प्रकार से अंग्रेजी गवर्नर जनरल रहते हुए भारत का संविधान तैयार हो रहा था।

भारत का संविधान कैसा बना कैसा नहीं, बात यह नहीं है! न ही मैं संविधान सभा के सदस्यों को अपमानित करने का सोच रहा हूँ। बल्कि मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि भारत के लोगों के साथ न्याय नहीं हुआ। संविधान सभा कई मामलों में विफल रही। जैसे कि भारत के लोगों को स्वतंत्रता नहीं दी गयी। जिन लोगों को यह नहीं पता कि चुनाव क्या होता है? चुनाव कैसे होते हैं? वोट किसे देना है? वोट कैसे देते हैं? उन लोगों के उपर पहला आम चुनाव थोप दिया गया। जागरूकता के नाम पर नेहरु का प्रचार और स्वतन्त्र मीडिया के नाम पर नेहरु की वाह वाही। जब मीडिया स्वतन्त्र नहीं, लोगों में जागरूकता नहीं, चुनाव भी पुरे देश में हुआ नहीं, चुनाव में हेर फेर न हो, इसका भी ध्यान रखा नहीं, चुनाव लड़ने वाले नेता भारतीय थे परन्तु पूरा एडमिनिस्ट्रेशन अंग्रेजी सरकार का था तो उस सिस्टम में चुनाव स्वतन्त्र रूप से हुए, इसकी भी कोई गारंटी नहीं। बाबजूद इसके पंडित नेहरु लगातार तीन बार स्वयं को प्रधानमन्त्री और अपने चमचों को सरकार में मंत्री बनाने में सफल हो गये।

सवाल यह नहीं कि चुनाव क्यों हुआ? सवाल यह है कि उस अंग्रेजी सिस्टम में लिए गये निर्णय भारत की जनता ने स्वीकार क्यों करे? नेताओं का जमीर बिका था भारत की जनता तो नहीं? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंदिरा गाँधी ने आपातकाल में संविधान में काफी परिवर्तन किए और जब इंदिरा गाँधी सत्ता से हटी और मोराजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार बनी तो उसनें वे सब परिवर्तन जो इंदिरा गाँधी ने किये थे, उनको रद्द कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योकिं इंदिरा गाँधी के द्वारा किये गये संविधान परिवर्तन में जनता की राय नहीं ली गयी।

ठीक यह कदम प्रथम सरकार के निर्णयों पर भी उठाना चाहिए। क्यों संविधान सभा ने भारत को सेक्युलर घोषित किया? क्या भारत की जनता से इस बारे में पूछा गया था? क्या लोगों से राय ली गयी कि वो किस प्रकार के देश में रहना चाहते हैं?  नहीं ली गयी। भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं बनाना चाहिए ऐसा कहने वाली कई पार्टियाँ हैं परन्तु कोई पार्टी यह कैसे कह सकती है? यह अधिकार सिर्फ जनता के पास है। अगर हिन्दू राष्ट्र पर देश का मूड जानना है तो एक आदर्श और डायरेक्ट लोकतंत्र प्रणाली का इस्तेमाल कर जनमत संग्रह करवाना चाहिए। लोगों के पास दो विकल्प हों कि उन्हें सेक्युलर देश चाहिए या हिन्दू राष्ट्र। परन्तु न तो इस प्रकार का कदम उठाया गया न ही कभी जनता की भावना को सुना गया। 



संविधान सभा में जब सेक्युलर शब्द जोड़ने का प्रस्ताव आया तो डॉ. अम्बेडकर ने विरोध करते हुए इसे लोकतंत्र विरोधी बताया। उन्होंने साफ़ कहा कि देश कैसा होगा यह मुट्ठीभर लोग तय नहीं कर सकते। यह फैसला जनता करेगी। सही मायने में संविधान सभा थी ही नहीं सब कुछ तय करने के लिए। 

डॉ. अम्बेडकर कहते हैं कि –

राज्य की नीति क्या होनी चाहिए, समाज अपने सामाजिक और आर्थिक पक्ष में कैसे संगठित होना चाहिए, ये ऐसे विषय हैं जिनका निर्णय समय और परिस्थिति के अनुसार लोगों को स्वयं करना चाहिए।


I regret that I cannot accept the amendment of Prof. K.T. Shah. My objections, stated briefly are two. In the first place the Constitution, as I stated in my opening speech in support of the motion I made before the House, is merely a mechanism for the purpose of regulating the work of the various organs of the State. It is not a mechanism where by particular members or particular parties are installed in office. What should be the policy of the State, how the Society should be organised in its social and economic sides are matters which must be decided by the people themselves according to time and circumstances. It cannot be laid down in the Constitution itself, because that is destroying democracy altogether. If you state in the Constitution that the social organisation of the State shall take a particular form, you are, in my judgment, taking away the liberty of the people to decide what should be the social organisation in which they wish to live.

(विस्तार से इस लिंक पर पेज न. 402 पर पढ़ सकते हैं )

कितनी बेशर्मी की बात है कि इंदिरा गाँधी ने आपातकाल के दौरान जब मौलिक अधिकार ससपेंड कर दिए गये, न्यायपालिका पर ताला लटका दिया गया, सांसदों को जेल में डाल दिया गया, उस समय बिना संसद की अनुमति के, बिना संसद में बहस के, बिना लोगों की सहमति से हमारे संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द डालकर देश को सेक्युलर घोषित कर दिया गया। सोशलिस्ट शब्द डालकर वामपंथ की जड़ों को स्थापित कर दिया गया। इससे भी बड़ी बेशर्मी की बात यह है कि मोराजी देसाई जब इंदिरा गाँधी के बाद प्रधानमन्त्री बने तो वह सरकार किसी एक पार्टी की नहीं थी बल्कि सभी पार्टियों ने मिलकर एक पार्टी बनाई। जनता पार्टी की सरकार को लोगों ने भर भरकर वोट दिए ताकि इंदिरा गाँधी के फैसले पलते जा सकें। परन्तु मोराजी देसाई सरकार भी धर्मनिरपेक्ष और सोशलिस्ट शब्द को नही हटाई। मुस्लिमों के विरोध के डर से वह यह कार्य नहीं कर सकी।     

अब समय आ गया है कि देश की जनता हिन्दू राष्ट्र के लिए आह्वान करे। देश की जनता धर्मनिरपेक्ष की गुलामी शब्द से मुक्ति पाए। यह कार्य जनता को ही करना होगा। सरकार यह कार्य कभी नहीं कर सकती बशर्ते उसके पास पूर्ण बहुमत हो। पूर्ण बहुमत की सरकार जो निर्णय लेगी वह जनता द्वारा मान्य व जनता की इच्छा समझा जाता है। अगर फिर भी सरकार चाहे तो जनमत संग्रह का रास्ता अपना सकती है। स्विट्ज़रलैंड आज भी अपने सभी फैसले जनमत संग्रह से करता है। भारत क्यों नहीं कर सकता।

सच मायनें में सरकार बहुत कुछ कर सकती है, परन्तु उसके ही भरोसे हम नही रह सके। हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए हमको आधार बनाना पड़ेगा। एक लहर तैयार करनी होगी जोकि विरोधियो को बहा ले जाये और सरकार के कान खोल दे।