नैतिकता का संकट: समाज, संस्थाएं और संसद



एक समय था जब नैतिक शिक्षा स्कूल पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा थी, लेकिन आधुनिकता के नाम पर इसे शिक्षा व्यवस्था से लगभग हटा दिया गया। परिणामस्वरूप, नैतिकता केवल चर्चा का विषय बनकर रह गई, परंतु व्यवहार में उसका स्थान लगातार घटता जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि समाज अपने नियम स्वयं बनाता है, और यह प्रक्रिया दीर्घकालिक होती है। प्रत्येक समाज अपने विचारों से निर्मित होता है, और जब वह किसी विचार को अपना लेता है, तो उसे दृढ़ता से बचाव करने का प्रयास भी करता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब राज्य व्यवस्था समाज पर अपने विचार थोपने लगती है और समाज को अपने परंपरागत विचारों की रक्षा का अधिकार भी छीन लिया जाता है।

समाज यदि बाहरी बंधनों से मुक्त नहीं होगा, तो उसका विकास अवरुद्ध हो जाएगा। आज भारतीय समाज जिस दमनकारी स्थिति में है, उसका मूल कारण यही है कि हमने समाज को अनावश्यक रूप से जकड़ दिया है। समाज की सोचने, निर्णय लेने और अपने मूल्यों को संरक्षित रखने की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई है। परिणामस्वरूप, हमें मूलभूत नैतिकता जैसे विषयों पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है।

समाज की संरचना व्यक्तियों से होती है, और व्यक्तियों के मिलने से परिवार तथा परिवारों के मिलने से मोहल्ले, गाँव और शहर बनते हैं। चाहे गाँव हो या शहर, सामाजिक परिवेश हर जगह मौजूद रहता है और नैतिकता पर चिंतन हर स्तर पर होता है। समाज जब किसी तत्व को बुराई के रूप में स्वीकार कर लेता है, तो उसके पीछे ठोस अनुभव और विचार होते हैं। उदाहरण के लिए, विवाहेतर संबंधों को समाज अनैतिक मानता है, लेकिन भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। यह निर्णय समाज के मूल नैतिक ढांचे को चुनौती देता है। हालाँकि, यह सत्य है कि न्यायपालिका में कार्य करने वाले अधिकांश लोग व्यक्तिगत रूप से इस कृत्य को अनैतिक ही मानते होंगे, परंतु पश्चिमी आधुनिकता से प्रभावित कुछ व्यक्तियों ने इसे कानूनी रूप से स्वीकार्य बना दिया। इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, क्योंकि अब यह बुराई कानूनी रूप से वैध मानी जा रही है।

यह एक उदाहरण है कि समाज को किस प्रकार जकड़ा जाता है। समाज अपनी स्वाभाविक प्रवाहशीलता के कारण गलत नहीं होता, बल्कि उसके प्रवाह में उत्पन्न व्यवधान उसे विकृत बना देते हैं। भविष्य में इतिहास यह लिखेगा कि 21वीं सदी में भारतीय समाज का नैतिक पतन इस हद तक हो गया था कि विवाहेतर संबंध कानून की दृष्टि में गलत नहीं थे।

लोकतंत्र के चार स्तंभ और नैतिकता

हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में तीन प्रमुख अंग हैं—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। यदि मीडिया को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्वीकार किया जाए, तो यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। इन चारों संस्थाओं की नैतिक स्थिति का विश्लेषण करना आवश्यक है।

आज जनता का गुस्सा मुख्य रूप से राजनेताओं पर केंद्रित रहता है। बॉलीवुड और मीडिया ने भी यह धारणा बना दी है कि सभी समस्याओं की जड़ केवल राजनेता ही हैं। कई कवियों और लेखकों ने संसद को भ्रष्टाचार का अड्डा बताया है। परंतु यदि देखा जाए, तो नैतिकता का सबसे अधिक पालन संसद में ही किया जाता है, जबकि अन्य संस्थाएँ नैतिकता के प्रति लगभग उदासीन हो चुकी हैं।

1. न्यायपालिका और नैतिकता: न्यायपालिका का कार्य समाज में न्याय सुनिश्चित करना होता है, परंतु आज यह संस्था स्वयं कई नैतिक प्रश्नों के घेरे में है। विवाहेतर संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाना एक उदाहरण है कि किस प्रकार न्यायपालिका समाज पर अप्राकृतिक विचार थोप रही है। यह चिंता का विषय है कि समाज जिस नैतिकता को आत्मसात कर चुका था, उसे न्यायपालिका ने अव्यवहारिक बना दिया। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि अन्य व्यक्ति से संबंध कानून जुर्म नहीं है परंतु तलाक का आधार हो सकता है यानि तलाक को प्रोमोट करने के सारे तरीके अपनाए जा रहे हैं। विश्व में सबसे कम शादी विच्छेदन के मामले वाले भारतीय समाज के सामने दो ऑप्शन रखे जा रहे हैं कि अगर कोई व्यक्ति या स्त्री किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध मे है तो तलाक ले लो या चुप होकर झेलो। समाज को वैश्यालय बनाने के इस तरीके पर सभी चुप हैं। कहाँ है न्यायपालिका की नैतिकता??

 

2. कार्यपालिका और नैतिकता: चुने हुए प्रतिनिधिओं को छोड़कर बाकी सभी सरकारी कर्मचारी यानि ब्यूरोक्रेसी या प्रशासनिक व्यवस्था को यदि देखा जाए, तो यह संस्थान भ्रष्टाचार का केंद्र बन चुके हैं। सरकारी तंत्र में कार्यरत अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं, परंतु कभी कोई विभाग यह नहीं कहता कि उसकी छवि धूमिल हुई है और इस पर कार्रवाई की जानी चाहिए। रिटायरमेंट उम्र तक लोगों को लूटने का ठेका प्राप्त कर चुके ये लोग क्या कभी नैतिकता के आधार पर कार्य करते हुए देखे जा सकते हैं? क्या कोई भी विभाग कभी सरकार से कहता है कि भ्रष्टाचार के कारण हमारी छवि धूमिल हुई है इसलिए जांच बिठाई जाए। क्या कभी किसी सरकारी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त करने के लिए उसी विभाग ने कोई कदम उठाया है? नैतिकता शून्य है। जिला मजिस्ट्रेट के द्वारा ही सारी फाइल गुजरती हैं – क्या किसी जिला मजिस्ट्रेट नें किसी भी भ्रष्टाचार के मामले पर इस्तीफा की पेशकश कि है। क्या कोई भी विभागीय व्यक्ति अपने विभाग में नैतिक मूल्य न बनाए रखने के कारण इस्तीफा देकर गया है?

 

3. मीडिया और नैतिकता: मीडिया आजकल नैतिकता के सभी पैमाने पीछे छोड़ लोकप्रियता की प्रतियोगिता में जुटा हुआ है। सबसे ज्यादा दर्शक कौन खींचेगा यही केवल एक सफल मीडिया संस्थान की परिभाषा है। मीडिया आजकल इसपर रिसर्च करती है कि जनता क्या देखना चाहती है और किसे देखना चाहती है? अगर कोई बेवकूफ व्यक्ति भी जनता के आकर्षण का केंद्र है तो मीडिया चैनल उसके इंटरव्यू के लिए लाइन लगाते हुए देखे जा सकते हैं। मीडिया ‘अपने वास्तविक कार्य’ को छोड़ सब कार्य करने लगा है। मीडिया द्वारा जनता में राजनीतिक समझ पैदा करने का भी चलन बढ़ा है जोकि अधिक खतरनाक है और ये काम करके राजनीतिक दलों के ऊपर हावी होकर मीडिया ने ऐसा ग्रीन पास हासिल किया जिसके बदौलत उसे सबकुछ करने की आजादी मिल चुकी है। मीडिया की स्वयं कि निगरानी रखने वाली संस्थाएं केवल इतना ध्यान रखती है कि किसी पत्रकार को कोई समस्या न हो, बाकी कंटेन्ट कैसा भी रहे। नैतिकता शून्य हो चुकी है। परिणामस्वरूप, फूहड़ता, अश्लीलता और भ्रामक सूचना प्रसारित की जाती है। नैतिकता पर यह मौन समाज के लिए घातक है।

4. विधायिका (संसद) और नैतिकता: अब बची संसद – यानि चुने हुए प्रतिनिधि। ये वो लोग हैं जिन्हें हम सबसे ज्यादा गाली देते हैं। आज राजनीतिक दल ही हैं जो नैतिकता की बातें करते हुए दिख जाएंगे। भ्रष्टाचार के आरोप पर किसी नेता को राजनीतिक दलों से निष्काषित करते हुए एक नहीं अनेक बार देखा गया है। नैतिक मूल्यों के हनन पर सरकारों से समर्थन वापस लेते हुए देखा गया है। आज भी भ्रष्टाचार के मामले पर राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं और प्रमुखता से मुद्दे रखते हैं। राजनेताओं की प्रत्येक सेकंड की दिनचर्या न सिर्फ जनता के सामने होती है बल्कि त्वरित विश्लेषण भी चलता रहता है। दिल्ली में आए चुनाव परिणाम बताते हैं कि किसी नेता का जेल जाना इतना बड़ा मामला है कि उस मुद्दे पर चुनाव भी हारा जा सकता है। राजनीति में बुराई है परंतु स्तर इतना भी नहीं गिरा है कि बुराई को सार्वजनिक स्तर पर स्वीकार किया जाए। मुझे लगता है कि संसद एकमात्र स्थान है जहां नैतिकता है।

समाज की भूमिका और नैतिकता की पुनर्स्थापना

आजकल यूट्यूब पर अनेक शो ऐसे हैं जो बने ही फूहड़ता, अश्लीलता और गालियों के लिए हैं। इन कार्यक्रम में भाग लेने वालों को मीडिया इतना प्रसिद्ध बना देता है जैसे समाज में सबसे महत्वपूर्ण ये ही लोग हैं। ऐसे ही एक शो के व्यक्ति को Unacademy जैसे कोचिंग सेंटर उसे अपने कार्यक्रम में बुलाते हैं। कौन बनेगा करोड़पति KBC में भी इस व्यक्ति को इसीलिए बुलाया गया क्योंकि वो बहुत प्रसिद्ध हो चुका है (प्रसिद्ध किस कारण है, यह जानते सब हैं)। पॉर्न ऐक्ट्रिस को बॉलीवुड में लेकर आना और फिर मीडिया द्वारा उसके इंटरव्यू लेकर घर घर प्रसिद्ध कर देना, यह इन सभी संस्थाओं की नैतिकता का पतन नहीं है तो क्या है?

अगर राहुल गांधी किसी वरिष्ठ नेता के सामने इज्जत से पेश नहीं आते तो वह राजनीति में एक मुद्दा बन जाता है। अगर कोई राजनेता के काफिले की वजह से किसी को ऑफिस पहुँचने में लेट हो जाए तो यह चर्चा का विषय बन जाता है। अगर किसी पर आरोप लगा जाए तो वह उसके राजनीतिक सफर को समाप्त तक कर देता है। क्या चरित्र के प्रति इतना गंभीर रहने की प्रवृति किसी अन्य जगह है? क्या किसी के व्यक्तिगत जीवन का विश्लेषण इतना होता है जितना राजनीतिक व्यक्तियों का?

नैतिकता के इस चर्चा में मैंने जनता को शामिल नहीं किया। जनता तो बुराई और अच्छाई का अथाह सागर है। यह लेख लिखने वाला मैं और पढ़ने वाले आप सब, इसी का हिस्सा हैं। जनता समाज की संरचना में आते ही स्वतः बुराई के प्रति खड़ी हो जाती है। समाज फ़िल्टर के रूप में स्वतः कार्य करने लग जाता है। अश्लील वीडियोज़ पर करोड़ों व्यू बता रहा है कि समाज उसे देख रहा है और उनके खिलाफ उठ रही आवाजें भी बता रही हैं की समाज बुराई के प्रति ऐक्टिव भी है। परंतु हमारे वो संस्थान क्या कर रहे हैं जिन्हें हमनें लोकतंत्र का स्तम्भ बनाया हुआ है।


अश्लीलता, फूहड़ता, महिलाओं के प्रति अभद्र टिप्पणियों का जन्मदाता एवं यौनअपराधों को सार्वजनिक स्वीकार्यता प्रदान करने वाले हर शो और सोशल मीडिया ट्रेंड को अगर रोकना है तो नैतिकता के प्रति मौन रहने वाले संस्थानों पर सवाल उठाने ही होंगे। न्यायपालिका से लेकर मीडिया तक, सबको कटघड़े में खड़ा करना ही होगा। बुराइयों को स्वीकार्यता देने वाले लोगों को दंडित किया जाना आवश्यक है। सभी संस्थाएं समाज को निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र कर दें या फिर यह सब तब संभव होगा जब समाज एकजुट होकर अपने प्रतिनिधियों पर दबाब बनाएगा। समाज अगर एकजुट हो तो क्या नहीं हो सकता? निर्भया के रेप पर राष्ट्रपति भवन के दरवाजों पर खड़ी लाखों की भीड़ नें जब हुंकार भरी तो रेप पर कानून बना। जब अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ समाज सड़क पर उतरा तो घोटाले वालों की सत्ता चली गई। आज अगर हम सिर्फ संसद के सांसदों पर इतना दबाब बना लें कि उनके हर सार्वजनिक कार्यक्रम, इंटरव्यू, रैली, या बैठकों में सबसे पहले यही प्रश्न करें कि आप अश्लीलता, फूहड़ता, महिलाओं के प्रति अभद्र टिप्पणियों का जन्मदाता एवं यौनअपराधों को सार्वजनिक स्वीकार्यता प्रदान करने वाले हर शो और सोशल मीडिया ट्रेंड पर रोकथाम के लिए कब कानून बनाएंगे तो संसद अवश्य विचार करेगी। नैतिकता संसद में ही जिंदा है और मुझे पूरा विश्वास है कि समाज इसमें सफल होगा।