नैतिकता का संकट: समाज, संस्थाएं और संसद

एक समय था जब नैतिक शिक्षा स्कूल पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा थी , लेकिन आधुनिकता के नाम पर इसे शिक्षा व्यवस्था से लगभग हटा दिया गया। परिणामस्वरूप , नैतिकता केवल चर्चा का विषय बनकर रह गई , परंतु व्यवहार में उसका स्थान लगातार घटता जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि समाज अपने नियम स्वयं बनाता है , और यह प्रक्रिया दीर्घकालिक होती है। प्रत्येक समाज अपने विचारों से निर्मित होता है , और जब वह किसी विचार को अपना लेता है , तो उसे दृढ़ता से बचाव करने का प्रयास भी करता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब राज्य व्यवस्था समाज पर अपने विचार थोपने लगती है और समाज को अपने परंपरागत विचारों की रक्षा का अधिकार भी छीन लिया जाता है। समाज यदि बाहरी बंधनों से मुक्त नहीं होगा , तो उसका विकास अवरुद्ध हो जाएगा। आज भारतीय समाज जिस दमनकारी स्थिति में है , उसका मूल कारण यही है कि हमने समाज को अनावश्यक रूप से जकड़ दिया है। समाज की सोचने , निर्णय लेने और अपने मूल्यों को संरक्षित रखने की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई है। परिणामस्वरूप , हमें मूलभूत नैतिकता जैसे विषयों पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है। समाज की संरचना व्यक्त...